हजारीबाग: रामगढ़ राज के अंतिम वारिस राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह एकीकृत बिहार में विपक्ष की राजनीति के ध्रुवतारा थे. राजतंत्र में पले-बढ़े होने के बावजूद उनकी विचारधारा गांधीवादी थी. 10 अगस्त 1916 को पदमा में जन्मे कामाख्या नारायण सिंह की 110वीं जयंती पर उन्हें हजारीबाग स्थित रामगढ़ हाउस में श्रद्धासुमन अर्पित किया गया जायेगा.
विनोबा भावे विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ प्रमोद कुमार ने कहा कि कामाख्या नारायण सिंह ने लोकतांत्रिक राजनीति में अपनी अलग पहचान बनायी. 1940 में रामगढ़ में आयोजित अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 53वें अधिवेशन को सफल बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण सहयोग किया था. इसका उल्लेख पट्टाभि सीतारमैया की पुस्तक कांग्रेस का इतिहास में भी मिलता है.
उन्होंने कहा कि राजतंत्र की समाप्ति के बाद लोकतंत्र में प्रवेश कर तीन दशकों से अधिक समय तक अपनी लोकप्रियता कायम रखना कामाख्या नारायण सिंह के राजनीतिक व्यक्तित्व की खास विशेषता थी. एकीकृत बिहार में क्षेत्रीय दलों की स्थापना की शुरुआत का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है.
भूदान यज्ञ में उन्होंने संत विनोबा भावे को देश में सर्वाधिक जमीन दान की थी. 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अपना निजी हेलीकॉप्टर भी राष्ट्र को समर्पित किया था. वर्ष 1947 से 1970 तक वे बिहार विधानसभा के विधायक रहे. 6 मई 1970 को हृदयाघात से कोलकाता में उनका निधन हुआ.
