यूनियन बोर्ड से नगर परिषद तक का सफर, परंतु, शहर की समस्या जस की तस

गुमला के यूनियन बोर्ड से नगर परिषद बनने तक का सफर और शहर की वर्तमान समस्याओं पर एक विस्तृत रिपोर्ट। जानें कैसे बदला गुमला का प्रशासनिक स्वरूप।

गुमला. गुमला के विजय आनंद ने कहा है कि सिविक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए हर शहर में एक संस्था होती है जो राज्य सरकार के अधीन कार्य करतीं है.‌‌ गुमला शहर में भी इस तरह‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ की एक संस्था है. जिसे नगर परिषद् के नाम से जाना जाता है. वैसे अविभाजित बिहार और झारखंड राज्य बनने के बाद इस नगर परिषद्‌ के नाम में परिवर्तन होता रहा है.

अविभाजित बिहार में सबसे पहले यह यूनियन बोर्ड के नाम से जाना जाता था. खपड़ैल‌‌ भाड़े के मकान‌‌ में यह संचालित होता था. इसके संचालन के लिए‌ राज्य सरकार पदाधिकारी मनोनीत करती थी. इसके बाद इसे नोटिफाइड‌‌‌ एरिया मेटी‌ नाम दे दिया गया. इस सिविक के लिए भी चुनाव नहीं होते थे. इस कमेटी के विभिन्नए सदस्यों का‌ मनोनयन भी राज्य सरकार ही करती थी.

इस कमेटी को बिहार सरकार ने ही बाद में नगरपालिका का नाम देकर इस सिविक संस्था को अपग्रेड कर दिया. अविभाजित बिहार में ही इस नगरपालिका को खपड़ैल मकान से हटाकर महावीर चौक जिसे अब पटेल चौक स्थित नवनिर्मित बिल्डिंग में ले जाया गया. वैसे इस पटेल चौक का पुराना नाम बड़ा चौक ही है. अविभाजित बिहार में नगरपालिका का संचालन चुने‍ हुए प्रतिनिधि करते थे.

कुछ वर्षों तक‌ महावीर चौक स्थित नगरपालिका भवन पालकोट रोड स्थित नये भवन में आ गया. पहले दस वार्डो वाला अब 22 वार्ड वाला नगर परिषद बन गया है. पहले तो इस सिविक संस्थान में आरक्षण नहीं था. अविभाजित बिहार में न जाति आरक्षण न और किसी प्रकार का आरक्षण. आरक्षण‌ का‌‌‌ मामला नहीं था. कोई भी व्यक्ति‌‌‌ चाहे‌ किसी समुदाय‌‌‌ का‌‌‌ हो‌. किसी भी वार्ड से‌ चुनाव लड़‍ सकता था.

बिहार सरकार 1973 के‌ सरकारी‌‌ गजट के तहत‌‌ गुमला‌ को नगरपालिका घोषित किया था. पहला नगरपालिका चुनाव अविभाजित बिहार में 1978 को हुआ था. जिसमें सत्यनारायण प्रसाद चेयरमैन चुने गये थे. रोचक बात यह कि‌ घाटो बगीचा के जिस‌ गली में वे रहते हैं‌‌. उस गली को चेयरमैन गली‌‌ कहा‌ जाने‌‌‌ लगा‌. आज भी वह गली इसी नाम से जाना है. इस गली के पूर्व में घाटो बगीचा मुहल्ला है. पश्चिम में एक गली है. उत्तर की ओर बाजार टाड़ है जो अपने उद्धार का इंतजार कर रहा है और‌ नगर‌ परिषद् का  हाल बंया कर रहा है‌‌.

वैसे तो‌ नगरपालिका, नगर पंचायत और नगर परिषद‌‌ जैसे नाम से अनेक‌ चुनाव हुए‌‌. लेकिन अविभाजित बिहार में‌ गुमला‌ नगरपालिका‌ का चुनाव‌‌‌‌‌‌ बिना‍ आरक्षण का‌ हुआ था. बिहार में भी यह निकाय सुपरशीट (निरस्त) रहा तो झारखंड में भी. झारखंड‌ सरकार ने तो अनेक प्रयोग‌ किया. मसलन कभी उपाध्यक्ष पद के लिए सीधे चुनाव कराया तो कभी नहीं. कभी‌ राजनीतिक पार्टियों के अनुसार तो कभी राजनीतिक दलों को इससे दूर‌ रखा. वैसे‌ कोई भी चुनाव होता है. उसमें राजनीति होती ही है.

बहरहाल कल का यूनियन बोर्ड, नोटिफाइड कमेटी‌ नगरपालिका‌ झारखंड राज्य में नगर पंचायत से‌ होकर आज नगर परिषद्‌ बदल गया है. हो सकता है कि कल नगर निगम बन जाये. लेकिन अभी भी शहर की सूरत बदलने की जरूरत है.


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लेखक के बारे में

By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

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