योद्धा से बने संत, इग्नासियुस लोयोला की कहानी प्रेरणा से भरी हुई है

जानिए योद्धा से संत बने इग्नासियुस लोयोला के जीवन का संघर्ष और उनकी प्रेरणादायक यात्रा के बारे में। पढ़ें उनका पूरा जीवन परिचय।

गुमला: संत इग्नासियुस लोयोला का आज (31 जुलाई) पर्व दिवस है. आज ही के दिन उनका निधन हुआ था. संत इग्नासियुस की जीवन की कहानी प्रेरणा से भरी पड़ी है. अगर हर एक मनुष्य उनके जीवन से शिक्षा ग्रहण करें तो निश्चित रूप से समाज में बदलाव आयेगा और चारों ओर खुशहाली होगी. किस प्रकार इग्नासियुस एक महान योद्धा के बाद धर्मसंघ की स्थापना की और वे संत बनें. यह रिपोर्ट उनके संघर्ष भरे जीवन पर आधारित है.

बाक इनिगो, जो बाद में इग्नासियुस कहलाये. 1491 ईस्वी में स्पेन के एक अभिजातीय परिवार में जन्मा इग्नासियुस योद्धा से संत बना था. जब वह एक सैनिक था तो अपने प्रदेश के लिए लड़ाई लड़ी. लड़ाई के बीच जख्मी हो गया और इलाज कराने लगा तो धार्मिक पुस्तकें पढ़कर मन परिवर्त्तन होने के बाद ख्रीस्त की सेवा में लग गये और उनके कार्यों ने पहले एक योद्धा और बाद में एक संत बना दिया.

संत इग्नासियुस प्लस टू उच्च विद्यालय गुमला के प्रधानाध्यापक फादर मनोहर खोया ने बताया कि 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध एवं 16वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में यूरोप संक्रमण काल के परिवर्त्तनों का शिकार हो गया था. परंपरागत ख्रीस्तीय सिद्धांतों, नियम-कानूनों, रीतिरिवाजों एवं रूढ़ियों पर कई बड़े-बड़े प्रश्न उठाने वाले सुधारकों का आविर्भाव हुआ.

इनमें मार्टिन लूथर, कालविन आदि के नाम स्मरणीय है. इन आपत्तियों के कारण पुरानी नींव पर खड़ी कलीसिया डगमगा गयी. ऐसे ही समय 1491 ईसवी में स्पेन के एक अभिजातीय परिवार में इग्नासियुस का जन्म हुआ. 13 भाई व बहनों में इग्नासियुस सबसे छोटा था और उसे तात्कालिक रीति के अनुसार कलीसिया की सेवा के लिए पुरोहित बनना था. तब इग्नासियुस ने इसका विद्रोह किया.

चूंकि उस समय वह बालक ही था. उसे सरकारी सेवा प्रशिक्षण के लिए जॉन वेलास्क दी शेलार के अधीन भेजा गया. जहां वह 26 वर्षों तक एक विलासी युवक की तरह जीवन व्यतीत करता रहा. उस समय उसे ईश्वर और धर्म से कोई खास लगाव नहीं था. उसमें मिथ्याभिमान था. उसमें दुनियावी सम्मान पाने की बड़ी लालसा थी और इसलिए उसे अस्त्र-शस्त्र से विशेष अभिरूचि थी. इसी बीच 1516 ईसवी में स्पेन के राजा फेरदीनंद की मृत्यु हो गयी.

जिसके बाद इग्नासियुस ने 1517 ईसवी में अपने पुराने काम को छोड़ दिया और सैनिक सेवा के लिए अपना नाम दर्ज करा लिया. इग्नासियुस सैनिक सेवा में लगे रहे. इसके कुछ सालों बाद 1521 ईसवी में फ्रांस के राजा ने नावार प्रदेश पर हमला किया. उस समय प्रदेश के पांपलोना के गढ़ की रक्षा में सैनिकों के साथ इग्नासियुस भी शामिल थे. फ्रांस सैनिकों द्वारा चलाया गया तोप का गोला इग्नासियुस के पैर में लगा.

वे गंभीर रूप से घायल हो गये. लेकिन दुश्मनों ने उसके अदम्य साहस से प्रभावित होकर उसे उसके घर लोयोला पहुंचा दिया. जहां इग्नासियुस के पैर का इलाज चल रहा था. इलाज के दौरान उन्होंने समय गुजारने के लिए रोमांचकारी एवं साहसिक कारनामों वाली किताबों की मांग की. लेकिन ऐसी किताबें नहीं मिलने के कारण उन्हें संतों की जीवनी व यीशु ख्रीस्त की जीवनी से संबंधित किताबें दी गयी.

जिसे पढ़ने के बाद इग्नासियुस के मन में परिवर्त्तन आया और उसके जीवन ने एक नया मोड़ लिया. वे जब अपने बीते जीवन के बाह्य आडंबर, मिथ्याभिमान आदि के बारे में सोचकर आत्मग्लानि हुई. उसे समझ में आ गया कि इस संसार के राजा तो दो-चार दिनों तक ही अपना प्रभुत्व रख पाते हैं. पर ख्रीस्त का राज्य तो अनंतकाल तक रहता है. जिसके बाद इग्नासियुस ने पश्चाताप किया.

जब वह चलने-फिरने लगा तो ख्रीसत का अनुशरण करने के लिए उसने ठोस कदम उठाया और वह लोयोला के लिए निकल पड़ा. जहां उन्होंने मोंटसेरात जाकर प्रार्थनालाय के माता मरिया की वेदी पर अपनी तलवार एवं कवच को अर्पित कर दिया और अपने पूर्व जीवन के सारे पापों के लिए पाश्चाताप एवं पाप स्वीकार किया. यहां तक उन्होंने अपने सारे राजसी कपड़ों को भी एक भिखारी को दे दिय और तपस्या व प्रार्थना में संलग्न हो गया.

जिसके बाद मार्च 1522 से फरवरी 1523 तक इग्नासियुस ने मनरेसा नामक जगह की एक गुफा में निरंतर प्रार्थना एवं कठोर तपस्या में जीवन व्यतीत किया. इस दौरान उन्हें कई अदभूत ईश्वरी अनुभव प्राप्त हुए. यहीं पर उसने अपनी प्रसिद्ध प्रभावशाली एवं प्रेरणादायक पुस्तक आध्यात्मिक साधनाएं की रूपरेखा तैयार की. यह पुस्तक ख्रीस्तीय परंपरा की एक महत्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है.

इसके बाद उन्होंने 1523-24 में पवित्र भूमि की तीर्थयात्रा की. फिर वापस स्पेन लौटकर उन्होंने 1524 से 1528 तक बारसेलोना, आलकाला व सालामांका में अध्ययन किया. इस दौरान उन्होंने बच्चों के साथ बच्चों की तरह लैटिन भाषा सीखी और बाद में दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया. लेकिन आलकाला व सालामांका में ख्रीस्तीय धर्म-परंपरा के नियम कानूनों के जानकारों ने इग्नासियुस की धार्मिक मान्यताओं को लेकर उसे बड़ी तकलीफ दी. जिसके बाद इग्नासियुस पेरिस चले गये.

जहां वे 1528 से 1535 तक रहे. इस दौरान उन्होंने पेरिस में अध्ययन के दौरान उनकी मुलाकात जेवियर फेवर, लाईनेज, सालमेरोन, रोड्रिगेज व बोबादिला से हुई और उनमें मित्रता हो गयी. सभी लोग वहां एक सामान्य विद्यार्थी थे और सभी समान रूप से सुसमाचार के उत्साही प्रेरित बने जा रहे थे. इग्नासियुस ने ही उन्हें प्रभु में मित्र कहा. सभी लोग इग्नासियुस को गुरू भी मानते थे.

वहीं इग्नासियुस की भी अपार इच्छा थी कि पुण्य भूमि येरूसलेम में वह अपना जीवन बिताये और प्रेरिताई का काम करें. इग्नासियुस ने 1534 में येरूसलेम जाने का व्रत भी लिया. इसके बाद कई वर्ष बित गये. इसी बीच 24 जून 1537 में इग्नासियुस एवं उनके मित्रों का पुरोहिताभिषेक हुआ. पुरोहित बनकर सेवा करने के दौरान इग्नासियुस ने येरूसालेम यात्रा की असंभावना को देखते हुए स्वयं को बिना किसी शर्तों के संत पापा के चरणों में समर्पित कर दिया. जिस पर संत पापा ने उन्हें प्रेरिताई के कार्य के लिए उत्तर इटली के विभिन्न स्थानों में भेज दिया और उनका दल बिखर गया.

जिसके बाद उन्होंने लंबी प्रार्थना व विचार-विमर्श के बाद एक नये धर्मसमाज की रूपरेखा तैयार की. जिसे इग्नासियुस ने संत पापा को सौंपा. जिसपर संत पापा पौलुस तृतीय ने कलिसिया के कल्याण के लिए इसे संभावित योगदान समझकर अनुमोदन कर दिया. जिसके बाद 27 सितंबर 1540 में यीशु समाज की औपचारिक स्थापना रेजिमिनी मिलीतांतिस एक्लेजिए के द्वारा की गयी. यह तिथि यीशु समाज की जन्म तिथि मानी जाती है. जिसके बाद इग्नासियुस ने अपना समय संघ के संचालन एवं संघ के संविधान की संरचना में व्यतीत किया और अंत में 31 जुलाई 1556 में उनकी मृत्यु हो गयी.

जिसके बाद संत पापा पौलुस पांचवें ने 1609 ईसवी में धन्य घोषित किया तथा संत पापा ग्रेगोरी 15वें ने 1622 में संत घोषित किया. भारत में प्रवेश करने वाले प्रथम यीशु समाजी संत फ्रांसिस जेवियर हैं जो 1542 में भारत आये.

संत इग्नासियुस स्कूल की स्थापना 1934 ईस्वी में हुई थी

संत इग्नासियुस उच्च विद्यालय गुमला के प्रधानाध्यापक फादर मनोहर खोया ने कहा कि संत इग्नासियुस स्कूल की स्थापना सन 1934 ईस्वी में यीशु समाजी फादरों के द्वारा की गयी है. यह यीशु समाज धार्मिक संघ द्वारा स्थापित एवं संचालित और राज्य सरकार द्वारा प्रस्वीकृति व धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित विद्यालय है.

यह विद्यालय अपने अल्पसंख्यक स्वरूप बरकरार रखते हुए भी राज्य सरकार द्वारा निर्मित नियमों का पालन करता है. इसाई धार्मिक अल्पसंख्यक विद्यालय होने के कारण ईसा मसीह की शिक्षा एवं इसाई धार्मिक सिद्धांतों, नीतियों का पालन करना इसकी प्राथमिकता है.


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लेखक के बारे में

By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

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