गुमला के देवाकी बाबाधाम में मिले प्राचीन मंदिर के अवशेष, इतिहास को लेकर बढ़ी जिज्ञासा

गुमला के देवाकी बाबाधाम का प्राचीन इतिहास और सावन में श्रद्धालुओं की आस्था के बारे में विस्तार से जानें। यहाँ शिव भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

गुमला: गुमला से 28 किमी दूर घाघरा प्रखंड के देवाकी बाबाधाम हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. लेकिन इस धार्मिक स्थल के गर्भ में ऐसा इतिहास छिपा है. जिसकी चर्चा आज तक बहुत कम हुई है. स्थानीय बुजुर्गों की स्मृतियां, मंदिर परिसर से मिले अवशेष और जनश्रुतियां इस ओर संकेत करती है कि यहां कभी किसी राजा या स्थानीय शासक द्वारा भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया था, जो कालांतर में ध्वस्त हो गया.

देवाकी गांव के वरिष्ठ समाजसेवी रामनंदन साहू बताते हैं कि जब वे बचपन में बाबा धाम मंदिर की ओर आते थे. तब मंदिर परिसर में नंदी की विशाल पत्थर की प्रतिमा, रथ के पहिए जैसी गोल पत्थर की आकृति तथा कई खंडित मूर्तियां बिखरी पड़ी रहती थीं. उस समय बच्चों के लिए ये केवल पत्थर थे. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने इतिहास का अध्ययन किया और इन अवशेषों को जोड़कर देखने का प्रयास किया.

रामनंदन साहू के अनुसार मंदिर परिसर में वर्षों तक बिखरी पड़ी प्रतिमाएं इस बात का संकेत देता है कि यहां कभी एक विकसित मंदिर परिसर रहा होगा. वे बताते हैं कि देवाकी कुसुम टोली निवासी बंधना उरांव को एक रात स्वप्न में इस स्थान पर शिवलिंग होने का संकेत मिला. इसके बाद खुदाई की गयी.

जिसमें मिट्टी के नीचे से शिवलिंग प्राप्त हुआ. खुदाई के दौरान वर्तमान ईंटों की तुलना में कई गुना बड़े आकार की प्राचीन ईंटें भी मिलीं. स्थानीय लोगों का मानना है कि ये अवशेष किसी प्राचीन मंदिर के हैं.

रामनंदन साहू, प्रबुद्ध ने बताया कि मुगल सम्राट औरंगज़ेब के शासनकाल में उसके सेनापति एवं बिहार के सूबेदार दाऊद ख़ान ने पलामू किले पर चढ़ाई की थी. ऐतिहासिक स्रोतों में पलामू के कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों को क्षति पहुंचने का उल्लेख मिलता है. उसी समय देवाकी बाबा धाम के प्राचीन मंदिर भी ध्वस्त किया गया होगा.

देवाकी बाबाधाम आज के दिन में काफी प्रसिद्ध धार्मिक शिवनगरी के रूप में जाना जाता है. यहां सावन माह में दूर दूर से भक्त आते हैं. बाबाधाम की प्रसिद्धी को देखते हुए यहां प्रशासन द्वारा कई विकास के काम किया गया है. मंदिर में विकास कार्य तेजी से हुआ है. पर्व में विधि व्यवस्था रहती है.


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By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

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