आजादी के दशकों बाद भी यहां के ग्रामीणों के लिए शुद्ध पेयजल एक सपना बना हुआ है. प्राकृतिक संसाधनों की मौजूदगी और सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद झरना गांव की तस्वीर कुछ और हकीकत बयां करती है. झरना गांव के लोगों के लिए खेतों के बीच स्थित एक छोटी सी डांड़ी ही पीने के पानी का एकमात्र सहारा है. गांव से लगभग आधा किलोमीटर दूर इस डांड़ी तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को उबड़-खाबड़ रास्ते से गुजरना पड़ता है. खासकर महिलाएं और बच्चे रोजाना इसी रास्ते से पानी ढोने को मजबूर हैं. गर्मी के दिनों में जहां पानी का स्रोत कम हो जाता है, वहीं बरसात के मौसम में यही पानी गंदा, मटमैला और बदबूदार बन जाता है. इसके बावजूद ग्रामीणों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता. बरसात के दिनों में डांड़ी का पानी दूषित हो जाने से गांव में पेट संबंधी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. ग्रामीण बताते हैं कि दस्त, उल्टी, पेट दर्द जैसी समस्याएं यहां होती रहती हैं.
स्वास्थ्य पर पड़ रहा प्रतिकूल असर
गांव की एक महिला बताती हैं कि हम जानते हैं कि पानी साफ नहीं है, लेकिन बच्चों को प्यासा भी तो नहीं रख सकते. मजबूरी में वही पानी उन लोगों को पीना पड़ता है. बुजुर्गों और छोटे बच्चों के स्वास्थ्य पर इसका सबसे खराब असर पड़ता है, लेकिन इलाज के साथ-साथ पानी की समस्या जस की तस बनी रहती है. झरना गांव में जल संरक्षण के उद्देश्य से जल छाजन योजना के तहत दो तालाबों का निर्माण कराया गया. इन तालाबों में बारिश का पानी इकट्ठा होता है, जिसका उपयोग ग्रामीण स्नान करने, कपड़े धोने और अन्य घरेलू कार्यों को करने के लिए करते हैं. हालांकि, इन तालाबों का पानी पीने योग्य नहीं है. आज तक गांव में ऐसा कोई स्थायी और सुरक्षित जल स्रोत विकसित नहीं किया गया, जिससे ग्रामीणों की प्यास बुझ सके.
आधी-अधूरी है पेयजल योजना
सरकार की महत्वाकांक्षी नल जल योजना से झरना गांव के लोगों को काफी उम्मीदें थीं. गांव में योजना को चालू करने को लेकर खंभे लगाने सहित कई काम तो शुरू किया गया, लेकिन योजना ने शुरू होने से पहले ही दम तोड़ दी. इस कारण पर्याप्त जल स्रोत नहीं मिलने का हवाला देकर योजना को शुरू होने से पहले ही बंद कर दिया गया. ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारियों ने सिर्फ औपचारिक सर्वे किया और जमीन से पानी नहीं निकलने की बात कहकर हाथ खड़े कर दिये.
शिकायत करने पर भी नहीं हो रही पहल
कभी झरना गांव में एक चापानल था, जिससे कुछ हद तक ग्रामीणों को राहत मिलती थी, लेकिन यह चापाकल भी लंबे समय से खराब पड़ा है. ग्रामीणों का कहना है कि इसकी मरम्मत के लिए पंचायत, प्रखंड कार्यालय और संबंधित विभाग में कई बार शिकायत की गयी, लेकिन कोई पहलनहीं हुई. गांव के एक ग्रामीण ने बताया कि अगर चापाकल ठीक हो जाये, तो कम से कम बच्चों और बुजुर्गों को साफ पानी मिल सकता है, लेकिन हमारी सुननेवाला कोई नहीं है,
