दीक्षा के बाद मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने नवदीक्षित मुनिराजों को साधु जीवन के मूल तत्वों का बोध कराया. कहा कि साधु बनने के बाद भी संसार के आकर्षण और विकार मन में आ सकते हैं, किंतु सच्चा साधु उनसे ऊपर उठकर आत्मशुद्धि की साधना करता है. स्पष्ट किया कि साधु जीवन का उद्देश्य ना तो पूजा पाना है और ना ही समाज से सम्मान या संरक्षण प्राप्त करना, बल्कि आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की साधना है. उन्होंने भगवान महावीर से लेकर आचार्य कुंदकुंद और आचार्य विद्यासागर महाराज की परंपरा का उल्लेख किया.
साधु का लक्ष्य अपने अंतर्मन को निर्मल बनाना है
साधु का लक्ष्य अपने अंतर्मन को निर्मल बनाना है. भावुक होते हुए उन्होंने बताया कि वे कोई नया कार्य नहीं कर रहे हैं, बल्कि वर्ष 2019 में नेमावर में आचार्य विद्यासागर महाराज द्वारा सौंपी गयी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं. नवदीक्षित साधकों ने पूर्व में ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर वर्ष 2020 से निरंतर तप और संयम के साथ साधना की. इसके बाद वे दीक्षा के योग्य बने. मुनि श्री ने कहा कि साधु जीवन का आधार समाज की प्रशंसा नहीं, बल्कि 28 मूलगुणों की रक्षा और पंचाचार का पालन करना है. उन्होंने शिष्यत्व की व्याख्या की. कहा कि आदर्श शिष्य स्वयं को गुरु के हाथों में बांसुरी की तरह समर्पित कर देता है. समाज को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि साधु-संतों का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनकी मर्यादा की रक्षा और सेवा से होता है.
कई धार्मिक अनुष्ठान हुए
गुणायतन मध्यभारत के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी के अनुसार सम्मेदशिखर में यह दीक्षा इसलिए भी विशेष रही कि एक मुनिराज द्वारा दूसरे मुनिराज को दीक्षा दी गयी. बताया कि इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं, जिनमें आचार्य ज्ञानसागर द्वारा मुनि विद्यासागर को मुनि अवस्था में दीक्षा देना प्रमुख है. इधर दीक्षा से पूर्व नवदीक्षार्थियों ने अपने भाव व्यक्त किए. विधिवत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ पंचमुष्टि केशलोंच व पंचगुरु भक्ति के माध्यम से दीक्षा संस्कार संपन्न हुआ. वस्त्र त्याग का दृश्य अत्यंत भावपूर्ण रहा. नवदीक्षित मुनिराजों को पिच्छिका, शास्त्र और कमंडल गुरुभक्त परिवारों द्वारा भेंट किये गये.
