गुणायतन परिसर के समवसरण में गणधर पीठ पर विराजमान होकर मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने धर्म के मूल स्वरूप को स्पष्ट किया. कहा कि धर्म के मुख्यतः दो ही मार्ग हैं, श्रावक और श्रमण धर्म. व्यक्ति या तो पूर्ण त्याग का मार्ग अपनाकर श्रमण बने, अथवा गृहस्थ जीवन में रहकर श्रावक धर्म का पालन करे. मुनि श्री ने श्रावक धर्म का सार बताते हुए कहा कि जो व्यक्ति मर्यादा, संयम और कुलाचार का पालन करता है, वह स्वभावतः दुराचार से दूर रहता है. उसके जीवन में शुद्ध आचार-विचार, सदाचार और धर्म की प्रतिष्ठा सदैव बनी रहती है. वहीं श्रमण धर्म त्याग, तप और आत्म साधना का सर्वोच्च मार्ग है, जिसमें व्यक्ति समस्त सांसारिक बंधनों का परित्याग कर मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होता है. दोनों ही मार्ग आत्मकल्याण के साधन हैं. एक गृहस्थ जीवन में मर्यादा के साथ और दूसरा पूर्ण त्याग के साथ.
Giridih News :श्रावक व श्रमण दोनों ही मार्ग आत्मकल्याण के साधन : प्रमाण सागर
Giridih News :गुणायतन परिसर के समवसरण में गणधर पीठ पर विराजमान होकर मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने धर्म के मूल स्वरूप को स्पष्ट किया. कहा कि धर्म के मुख्यतः दो ही मार्ग हैं, श्रावक और श्रमण धर्म. व्यक्ति या तो पूर्ण त्याग का मार्ग अपनाकर श्रमण बने, अथवा गृहस्थ जीवन में रहकर श्रावक धर्म का पालन करें.
