मुनि श्री संधान सागर महाराज तथा नवदीक्षित मुनिराज मुनि श्री समादर सागर, मुनि श्री सार सागर और मुनि श्री रूप सागर की भी प्रथम आहार-चर्या संपन्न करायी गयी. आहारचर्या की शुरुआत श्रावक अशोक पाटनी व सुशीला पाटनी सहित देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं की उपस्थिति में हुई.
अक्षय तृतीया पर ही प्रथम तीर्थंकर ने ऋषभदेव ने इक्षुरस से आहार ग्रहण किया था
इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने अक्षय तृतीया के महत्व पर प्रकाश डाला. कहा कि यह दिवस जैन परंपरा में दान तीर्थ के रूप में विशेष स्थान रखता है. उन्होंने बताया कि इसी दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने दीर्घ उपवास के पश्चात इक्षुरस से आहार ग्रहण किया था. कहा कि गृहस्थ जीवन की वास्तविक शोभा दान से होती है. जो व्यक्ति दान करना नहीं जानता, वह धर्म का मर्म भी नहीं समझ सकता.दान के हैं चार सूत्र
प्रमाण सागर ने दान के सूत्र बताये. कहा कि दान के चार मूल किसे, कितना, क्यों और कब पर देना है. दान सदैव निष्काम भाव से किया जाना चाहिए, ना कि नाम-यश या स्वार्थ की भावना से. उन्होंने कहा कि न्यायपूर्ण और नैतिक तरीके से अर्जित धन का एक भाग दान में लगाने से अंत:करण की शुद्धि होती है, आसक्ति कम होती है और उदारता का विकास होता है. केवल धन संचय पर्याप्त नहीं, उसे सार्थक दिशा में लगाना भी उतना ही आवश्यक है. मुनि श्री ने एक प्रेरक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार आचार्य के मार्गदर्शन में किया गया छोटा सा दान भी जीवन की दिशा बदल सकता है और व्यक्ति को निराशा से उबार सकता है. कार्यक्रम के में बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया, अभय भैया सहित अनेक श्रद्धालु व श्रावकों ने मुनिराजों को श्रद्धापूर्वक आहार अर्पित किया. समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही.
