ये उद्गार गुणायतन प्रणेता राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कोयले में अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता विद्यमान है. सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के माध्यम से कर्मों का क्षय कर आत्मा को शुद्ध बनाकर कोई भी जीव परम सिद्ध पद प्राप्त कर सकता है.
तीर्थंकरों के स्वरूप की व्याख्या की
मुनि श्री ने तीर्थंकरों के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा कि जैन धर्म में तीर्थंकर वे महान पुण्यात्माएं हैं, जो स्वयं पुरुषार्थ के बल पर मोक्षमार्ग प्राप्त करती हैं तथा भव्य जीवों के कल्याण हेतु धर्म तीर्थ की स्थापना करती हैं. वे साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका रूपी चतुर्विध संघ का गठन कर धर्म का प्रवर्तन करते हैं, इसलिए उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है.अवतरावाद को जैन धर्म स्वीकार नहीं करता
अवतारवाद पर मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन अवतारवाद को स्वीकार नहीं करता. उन्होंने स्पष्ट किया कि एक ही आत्मा का बार-बार जन्म लेकर अवतरित होना जैन सिद्धांत के अनुरूप नहीं है. जैन दर्शन के अनुसार जन्म-मरण का चक्र राग, द्वेष और मोह के कारण चलता है. जो महापुरुष इन तीनों कषायों का पूर्ण क्षय कर लेते हैं, वे देह त्याग के पश्चात लोक के सर्वोच्च भाग स्थित सिद्धशिला में विराजमान हो जाते हैं. वही सिद्ध परमात्मा कहलाते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता. मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे तीर्थंकरों द्वारा बताये गये मार्ग पर चलकर आत्मा की पहचान एवं उसकी शुद्धि का प्रयास करें. यही सच्ची धर्म आराधना है.
