125 वर्ष पुराना हैं गढ़वा के रक्सी का स्वप्न शिव मंदिर, जहां कभी नहीं भरता शिवलिंग का अर्घा

रमकंडा का स्वप्न शिव मन्दिर जिसका अरघा कभी नही भरता, 125 वर्षपहले चैनपुर स्टेट के राजा ने कराया था निर्माण

मुकेश तिवारी की रिपोर्ट गढ़वा: झारखंड का गढ़वा जिला दैवीय शक्तियों और चमत्कारों से भरा है. गढ़देवी, वंशीधर, सतबहिनी जैसे पौराणिक मंदिरों के बीच रमकंडा प्रखंड के रक्सी गांव में स्थित एक शिव मंदिर अपनी अनोखी मान्यता के लिए प्रसिद्ध है.

कभी नहीं भरता अर्घा

रमकंडा मुख्यालय से करीब 5 किमी दूर रक्सी में स्थित इस शिव मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है इसका अर्घा. पुजारी गोपाल पाण्डेय और ग्रामीणों के अनुसार शिवलिंग पर चाहे जितना जल या दूध चढ़ा दो, अर्घा हमेशा खाली ही रह जाता है. सावन में कई बार अर्घा को मिट्टी से बंद कर भरने की कोशिश की गई, लेकिन पानी फिर भी निकल जाता है. मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है.

125 साल पुराना है इतिहास

जानकारी के अनुसार यहां का शिवलिंग टांड में स्वयं प्रकट हुआ था. करीब 125 साल पहले चैनपुर स्टेट के राजा राय भागवत दयाल सिंह ने मंदिर निर्माण शुरू कराया था. किवदंती है कि राजा को पुत्र प्राप्ति के बाद शिवलिंग को चैनपुर ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन शिवलिंग लदा हाथी यहीं बैठ गया। इसके बाद यहीं मंदिर बनाने का निर्णय हुआ. राजा के निधन के बाद रानी साहिबा ने निर्माण पूरा कराया. तब से माघ महीने में एक सप्ताह का "माघ तेरस मेला" लगता है. आज भी मेले की पूजा की शुरुआत राजा के घर से भेजी गई सामग्री से होती है. मंदिर में पूजा के लिए नियुक्त रामदत पाण्डेय के वंशज आज भी पुजारी हैं.

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चमत्कार के और किस्से

स्थानीय लोग बताते हैं कि हाल में 50 फीट ऊंचे मंदिर की रंगाई-पुताई के दौरान एक युवक ऊपर से गिरा, लेकिन उसे खरोंच तक नहीं आई और वह तुरंत काम पर लग गया.एक अन्य कथा के अनुसार एक भक्त की पत्नी ने एक बार गलती से गर्म दूध शिवलिंग पर चढ़ा दिया था, जिससे शिवलिंग में दरार पड़ गई. वह निशान आज भी देखा जा सकता है. इसी वजह से इसे "स्वप्न शिव मंदिर" भी कहा जाता है. सावन के तीसरे सोमवार को बड़की नदी से जल लाकर यहां हजारों श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं। नक्सल प्रभावित और सुदूर क्षेत्र होने के कारण इस मंदिर को अब तक ज्यादा ख्याति नहीं मिल पाई है.


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