निष्काम भक्ति से मिलता है जीवन का असली वैभव, सुदामा चरित्र से रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने दिया संदेश

श्रीमद्भागवत कथा में रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने कहा कि निष्काम भक्ति ही जीवन का असली वैभव है। सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष प्रसंग से दी जीवन की सीख।

श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन सुदामा चरित्र, नवयोगेश्वर संवाद व परीक्षित मोक्ष प्रसंग की हुई व्याख्या

श्री बंशीधर नगर, गढ़वा : धन-संपत्ति नहीं, बल्कि निष्काम भक्ति ही मानव जीवन का सबसे बड़ा वैभव है. सच्ची भक्ति में मांग नहीं, बल्कि समर्पण का भाव होता है. यह बातें अयोध्या धाम से पधारे कथावाचक श्रीमद् जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने शुक्रवार को श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कहीं.

श्री राधा कृष्ण बंशीधर मंदिर के खलिहान प्रांगण में श्री बंशीधर सूर्य मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित कथा सप्ताह के सातवें दिन उन्होंने सुदामा चरित्र, नवयोगेश्वर संवाद और परीक्षित मोक्ष प्रसंग की व्याख्या की.

सुदामा चरित्र में दिखा निष्काम प्रेम

सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कथावाचक ने कहा कि वर्तमान समय में रिश्तों में स्वार्थ और अपेक्षाएं बढ़ रही हैं. ऐसे में सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता निष्काम प्रेम का अनुपम उदाहरण है. सुदामा अपनी गरीबी और परेशानी लेकर भगवान के पास नहीं गये थे, बल्कि मित्र के दर्शन की अभिलाषा से पहुंचे थे. श्रीकृष्ण ने बिना कुछ कहे ही उनके मन की पीड़ा समझ ली.

सत्संग और भक्ति से मिलती है मन को शांति

नवयोगेश्वर संवाद के प्रसंग में उन्होंने कहा कि मनुष्य के लिए अपने मन पर विजय पाना सबसे कठिन है. इच्छाओं के पीछे भागता मन कभी संतुष्ट नहीं होता. सत्संग, सदाचार और भगवद्भक्ति से ही मन को वास्तविक शांति मिलती है. उन्होंने कहा कि भौतिक साधनों के साथ जीवन में विनम्रता, संयम और सेवा की भावना भी जरूरी है.

महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने अंतिम क्षण का पता नहीं होता. इसलिए प्रत्येक दिन को महत्वपूर्ण मानकर भगवान का स्मरण करना चाहिए. विदाई के समय संसार की वस्तुएं साथ नहीं जातीं, केवल प्रभु का नाम और कर्म साथ रहते हैं.

उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का उद्देश्य केवल श्रवण तक सीमित नहीं है. कथा से यदि व्यवहार में परिवर्तन, अहंकार में कमी और करुणा का भाव पैदा हो, तभी कथा श्रवण सार्थक है. उन्होंने श्रद्धालुओं से भौतिक सुखों के साथ भक्ति और सदाचार को जीवन में अपनाने का आह्वान किया.

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By Avinash Singh

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