Garhwa News: सपने में भगवान ने दिया संकेत, कनहर किनारे मिली श्रीकृष्ण की प्रतिमा; आज इसी धाम में विराजते हैं मुरली वाले बंशीधर

गढ़वा के श्री बंशीधर नगर में स्थित भगवान कृष्ण के अलौकिक मंदिर का इतिहास और उनकी महिमा के बारे में जानें। यहाँ भगवान ने स्वयं अपना स्थान चुना था।

श्री बंशीधर नगर, गढ़वा : भगवान श्रीकृष्ण की मुरली की धुन और उनके अलौकिक स्वरूप की भक्ति में ऐसी शक्ति है कि श्री बंशीधर नगर पहुंचने वाला श्रद्धालु कुछ पल के लिए दुनिया की चिंताओं को भूल जाता है. गढ़वा जिले की यह नगरी भगवान श्रीकृष्ण के बंशीधर स्वरूप के भव्य मंदिर के कारण देशभर में अपनी अलग पहचान रखती है. मान्यता है कि सच्चे मन से बंशीधर के दरबार में मांगी गयी मुराद पूरी होती है. यही आस्था दूर-दराज से श्रद्धालुओं को यहां खींच लाती है.

स्वप्न में हुए भगवान के दर्शन, फिर शुरू हुई धाम तक पहुंचने की कहानी

श्री बंशीधर मंदिर का इतिहास भगवान श्रीकृष्ण की लीला से जुड़ी मान्यताओं से भरा है. नगर ऊंटारीगढ़ के महाराजा स्वर्गीय भवानी सिंह की पत्नी रानी शिवमानी कुंवर को भगवान श्रीकृष्ण ने स्वप्न में दर्शन दिया था. मान्यता के अनुसार भगवान ने उन्हें कनहर नदी के किनारे स्थित शिव पहाड़ी पर अपनी प्रतिमा के होने की जानकारी दी.

इसके बाद रानी शिवमानी कुंवर ने भगवान के निर्देश पर प्रतिमा को नगर ऊंटारी लाने का निर्णय लिया. उनका विचार था कि भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को राजमहल में स्थापित किया जाये. लेकिन मान्यता है कि भगवान की इच्छा कुछ और थी.

राजमहल में नहीं, बाहर स्थापित हुई प्रतिमा

प्रतिमा को राजमहल के अंदर स्थापित करने की योजना थी, लेकिन वह राजमहल के बाहर समिति की जमीन पर स्थापित हुई. बाद में इसी स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. श्रद्धालु इसे भगवान बंशीधर का स्वयं अपना स्थान चुनना मानते हैं.

प्रभात खबर की पुरानी रिपोर्ट में भी मंदिर की परंपरा से जुड़ा यह उल्लेख मिलता है कि रानी शिवमानी कुंवर को 14 अगस्त 1827 की जन्माष्टमी पर स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए थे. इसके बाद कनहर नदी के किनारे शिव पहाड़ी पर खुदाई के दौरान श्रीकृष्ण की प्रतिमा मिलने की बात सामने आती है.

भगवान बंशीधर के नाम से बदली नगर की पहचान

भगवान श्रीकृष्ण के बंशीधर स्वरूप के मंदिर की वजह से नगर ऊंटारी की पहचान समय के साथ बदल गयी. वर्ष 2018 में नगर ऊंटारी का नाम बदलकर श्री बंशीधर नगर कर दिया गया था.

आज यह नगरी केवल एक शहर के रूप में नहीं, बल्कि भगवान बंशीधर की नगरी के रूप में पहचानी जाती है. मंदिर में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा का स्वरूप श्रद्धालुओं को विशेष रूप से आकर्षित करता है. दूर-दराज से आने वाले भक्त प्रतिमा की अलौकिक छवि को देखकर अभिभूत हो जाते हैं.

जन्माष्टमी पर कृष्णमय हो उठता है श्री बंशीधर धाम

जन्माष्टमी के अवसर पर श्री बंशीधर मंदिर की रौनक देखते ही बनती है. पर्व से कई दिन पहले ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की चहल-पहल बढ़ने लगती है. धार्मिक आयोजनों के साथ श्रीमद्भागवत कथा, प्रवचन और रासलीला से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है.

इस वर्ष भी 29 अगस्त से श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया है, जो 5 सितंबर तक चलेगा. वहीं 4 सितंबर को जन्माष्टमी का पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया जायेगा. इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के श्री बंशीधर मंदिर पहुंचने की उम्मीद है.

आस्था का वह धाम, जहां भगवान ही हैं पहचान

श्री बंशीधर नगर की पहचान यहां की गलियों, बाजारों या इमारतों से कहीं ज्यादा भगवान बंशीधर से जुड़ी है. श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था का वह केंद्र है, जहां भगवान श्रीकृष्ण स्वयं विराजमान माने जाते हैं.

जन्माष्टमी पर जब मंदिर परिसर भगवान बंशीधर के जयकारों से गूंजता है और श्रद्धालु मुरली वाले के दर्शन के लिए उमड़ते हैं, तो पूरा श्री बंशीधर नगर कृष्णमय हो उठता है. यही आस्था इस नगरी को देश के धार्मिक मानचित्र पर एक अलग पहचान देती है.

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By Avinash singh

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