गढ़वा में लगातार बढ़ रहा भू-विवाद, जनता दरबार में आधे से ज्यादा मामले जमीन के

गढ़वा में लगातार बढ़ रहा भू-विवाद, जनता दरबार में आधे से ज्यादा मामले जमीन के

पीयूष तिवारी, गढ़वा

गढ़वा जिले में भूमि विवाद लगातार जटिल समस्या बनता जा रहा है. न्यायालयों में वर्षों से लंबित मामले, प्रशासनिक शिथिलता, ऑनलाइन रिकॉर्ड में त्रुटियां और शहर का तेजी से बढ़ता दायरा विवाद की बड़ी वजह बन रहे हैं. जिले में आये दिन जमीन विवाद को लेकर मारपीट और तनाव की घटनाएं सामने आ रही हैं. थाना, न्यायालय, थाना दिवस, अंचल दिवस और उपायुक्त के जनता दरबार में बड़ी संख्या में भूमि विवाद से जुड़े मामले पहुंच रहे हैं. उपायुक्त का जनता दरबार सप्ताह में मंगलवार और शुक्रवार को आयोजित होता है. पहले जहां जनवितरण प्रणाली, पेंशन, मनरेगा और भ्रष्टाचार से जुड़े आवेदन अधिक आते थे, वहीं पिछले तीन-चार वर्षों से जमीन विवाद से जुड़े मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है. जनता दरबार में अतिक्रमण, जबरन जमीन जोतने, गलत म्यूटेशन, फर्जी रजिस्ट्री, ऑनलाइन त्रुटि सुधार, सीमांकन नहीं होने और भूमि माफियाओं के कब्जे से जमीन मुक्त कराने जैसे मामले बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं. प्राप्त कुल आवेदनों में लगभग आधे आवेदन भूमि विवाद से संबंधित हैं. इन मामलों को संबंधित अंचल पदाधिकारी, अपर समाहर्ता और अन्य विभागों को कार्रवाई के लिए भेजा जाता है.

जनता दरबार में बढ़े भूमि विवाद के मामले

28 अप्रैल: कुल आवेदन 38, भूमि विवाद के मामले 24

5 मई: कुल आवेदन 60, भूमि विवाद के मामले 36

8 मई: कुल आवेदन 40, भूमि विवाद के मामले 16

12 मई: कुल आवेदन 47, भूमि विवाद के मामले 21

16 मई: कुल आवेदन 40, भूमि विवाद के मामले 18

19 मई:. कुल आवेदन 59, भूमि विवाद के मामले 18

अधूरा सर्वे बना बड़ी परेशानी

झारखंड गठन के बाद नक्सलवाद कम होने के साथ गढ़वा शहर का विस्तार आसपास के गांवों तक तेजी से हुआ है. वहीं एनएच-39 निर्माण के बाद गढ़वा, मेराल, रमना और नगरऊंटारी क्षेत्रों में जमीन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है. इससे भूमि माफियाओं की सक्रियता भी बढ़ गयी है. कई जगहों पर बिना विवाद वाली जमीन को भी विवादित बनाया जा रहा है और फर्जी दस्तावेज तैयार किये जा रहे हैं. गढ़वा, मेराल, डंडई और डंडा प्रखंडों में अब तक नये सर्वे खतियान का अंतिम प्रकाशन नहीं हो पाया है. कई दशकों से भू-सर्वेक्षण का कार्य अधूरा पड़ा है. ऐसे में जरूरत पड़ने पर वर्ष 1908 के पुराने सर्वे खतियान का सहारा लेना पड़ता है, जो बेहद जर्जर स्थिति में कुछ पुराने भू-स्वामियों के पास ही उपलब्ध हैं. संबंधित अंचल कार्यालयों में भी पुराने रिकॉर्ड नहीं होने से जमीन की प्रकृति और सीएनटी एक्ट से जुड़ी स्थिति स्पष्ट करना मुश्किल हो रहा है.

1976-77 में शुरू हुआ सर्वे आज तक अधूरा

गढ़वा में एकीकृत बिहार के समय वर्ष 1976-77 में भू-सर्वेक्षण का कार्य शुरू हुआ था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका है. रंका, रमकंडा, भंडरिया और चिनिया समेत कई अंचलों के 223 राजस्व गांवों के पुराने भू-नक्शे गायब बताये जा रहे हैं. ऑनलाइन रिकॉर्ड में गड़बड़ी भी बड़ी वजह

जिले के कई गांवों, खासकर कांडी अंचल के 26 गांवों के खतियान की ऑनलाइन इंट्री अब तक नहीं हो सकी है. जबकि वर्ष 2016 से जमीन के दस्तावेजों को ऑनलाइन किया जा रहा है. कई अंचलों में नये खतियान को तो ऑनलाइन अपलोड कर दिया गया, लेकिन रजिस्टर टू अपलोड नहीं होने से वर्तमान भू-स्वामी की जानकारी स्पष्ट नहीं हो पा रही है. भूमि रिकॉर्ड की इन खामियों, अधूरे सर्वे और प्रशासनिक लापरवाही के कारण जिले में भूमि विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है.

भू-माफियाओं की सूची तैयार

गढ़वा जिले में भूमि विवादों को बढ़ावा देने वाले 31 लोगों की सूची पुलिस और अंचल प्रशासन ने मिलकर तैयार की है. इसमें वे लोग शामिल हैं, जिनके खिलाफ पिछले 10 वर्षों में दो या दो से अधिक बार शिकायतें दर्ज हुई हैं. सूची में शिवनारायण चौधरी, नवाजिश अंसारी, उदय शेख, कृष्णा कुमार, अनिल पासवान, अनिल शर्मा, श्याम राज शर्मा, मदन चंद्रवंशी, रजनीकांत, रमेश चौबे, विक्की चौबे, दरोगा यादव, पंकज कुमार, आसिफ रजा, शंभू रजवार, प्रवेश, भोला, अमानुल्लाह, अजय, मुखलाल सहित आदि शामिल है.

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लेखक के बारे में

Author: Akarsh Aniket

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