मकर संक्रांति पर जिले में दिखता है प्रकृति, आस्था व परंपरा का अद्भुत संगम

मकर संक्रांति पर दूसरे राज्यों से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु

मकर संक्रांति पर दूसरे राज्यों से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु जितेंद्र सिंह, गढ़वा नदियों, झरनों और पहाड़ों से घिरे गढ़वा जिले में मकर संक्रांति का पर्व हर वर्ष विशेष उत्साह, आस्था और सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाया जाता है. यह पर्व यहां केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ग्रामीण जीवन, लोकसंस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का भव्य उत्सव बन जाता है. मकर संक्रांति के अवसर पर जिले के विभिन्न रमणीक स्थलों पर बड़े-बड़े मेले लगते हैं, जिनमें झारखंड के साथ-साथ छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और बिहार से भी हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं. पर्व के दिन सुबह से ही लोग पवित्र नदियों और झरनों में स्नान कर सूर्य देव की उपासना करते हैं. इसके बाद दही-चूड़ा और लाई जैसे पारंपरिक व्यंजनों का सेवन कर लोग परिवार और समुदाय के साथ पर्व की खुशियां साझा करते हैं. मेले में बच्चों के लिए झूले, खिलौनों की दुकानें, ग्रामीण हाट, लोकगीत-संगीत और पारंपरिक खानपान आकर्षण का केंद्र रहते हैं, जिससे पूरे जिले में उत्सव का माहौल बन जाता है. सुखलदरी जलप्रपात पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़ धुरकी प्रखंड में कनहर नदी पर स्थित सुखलदरी जलप्रपात मकर संक्रांति के दिन आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है. झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाली इस नदी के तट पर हर वर्ष भव्य मेले का आयोजन होता है. श्रद्धालु नदी में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं और दिनभर मेले का आनंद लेते हैं. भीड़ को नियंत्रित करने और सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने के लिए प्रशासन और पुलिस की ओर से व्यापक इंतजाम किये जाते हैं. यहां स्थानीय स्तर पर तैयार लोहे से बने पारंपरिक सामानों की भी खूब बिक्री होती है. गुरुसिंधु जलप्रपात में जीवंत होती है पुरानी परंपरा चिनिया प्रखंड स्थित गुरुसिंधु जलप्रपात के समीप लगने वाला मकर संक्रांति मेला जिले के सबसे पुराने और प्रसिद्ध मेलों में एक है. वर्षों पुरानी परंपरा के कारण यहां श्रद्धालुओं की आस्था गहराई से जुड़ी हुई है. प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे इस स्थल पर स्नान, पूजा और मेले की रौनक एक साथ देखने को मिलती है. कनहर नदी के उप पार छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं. श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहता है सतबहिनी झरना कांडी प्रखंड का सतबहिनी झरना तीर्थ स्थल मकर संक्रांति के दिन श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहता है. यहां आने वाले श्रद्धालु पहले झरने में स्नान करते हैं, फिर शृंखलाबद्ध मंदिरों में दर्शन-पूजन करते हैं. पूजा के बाद दही-चूड़ा और लाई ग्रहण कर परिवार के साथ मेले का आनंद लेते हैं. धार्मिक आस्था के साथ-साथ यह स्थल अपनी अनुपम प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी लोगों को आकर्षित करता है. सोन और कोयल तटीय इलाकों में रहती है विशेष रौनक मकर संक्रांति के अवसर पर सोन और कोयल नदियों के तटीय इलाकों में भी विशेष रौनक देखने को मिलती है. सोन नदी से जुड़े खरौंधी, केतार और कांडी तथा कोयल नदी से जुड़े गढ़वा और मझिआंव प्रखंडों में दर्जनों स्थानों पर मेले का आयोजन होता और यहां स्नान के लिए भी भारी संख्या में लोग पहुंचते हैं. स्नान के बाद लोग पारंपरिक भोजन कर पर्व की खुशियां मनाते हैं. क्यों है गढ़वा में लगने वाले मेलों का अंतरराज्यीय महत्व भौगोलिक दृष्टिकोण से गढ़वा जिला झारखंड का महत्वपूर्ण क्षेत्र है. यह जिला छत्तीसगढ़, बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमाओं से सटा हुआ है. इसी कारण मकर संक्रांति जैसे बड़े और आस्था से जुड़े पर्वों पर इन राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक गढ़वा पहुंचते हैं. अंतरराज्यीय भागीदारी के कारण यहां लगने वाले मेले न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखते हैं.

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By Akarsh Aniket

Akarsh Aniket is a contributor at Prabhat Khabar.

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