भूमिगत खदानों में बैकफिलिंग के लिए प्राकृतिक बालू के विकल्प की तलाश में आइआइटी आइएसएम के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं को महत्वपूर्ण सफलता मिली है. विभागाध्यक्ष प्रो. भंवर सिंह चौधरी के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने फ्लाई ऐश और प्लास्टिक वेस्ट से फ्लाई ऐश-प्लास्टिक एग्रीगेट (एफपीए) तैयार किया है. पोलैंड के विशेषज्ञों के सहयोग से हुए इस शोध में तैयार एफपीए को लैब परीक्षण में मजबूत, टिकाऊ और बेहतर ड्रेनेज क्षमता वाला पाया गया है.
80 प्रतिशत फ्लाई ऐश और 20 प्रतिशत प्लास्टिक वेस्ट से तैयार
मिनिस्ट्री ऑफ कोल से फंडेड प्रोजेक्ट के तहत प्रो. भंवर सिंह चौधरी और रिसर्च स्कॉलर डॉ. मुनिपाला मनोहर ने एफपीए तैयार किया है. इसके लिए 80 प्रतिशत फ्लाई ऐश और 20 प्रतिशत एचडीपीई प्लास्टिक वेस्ट को थर्मल प्रोसेस के माध्यम से मिलाया गया. शोधकर्ताओं के अनुसार, तैयार मटेरियल का वजन प्राकृतिक बालू की तुलना में कम है. ऐसे में इसे स्लरी पाइपलाइन के माध्यम से भूमिगत खदानों तक पहुंचाना आसान हो सकता है.
रफ और एंगुलर सतह से बढ़ेगी मजबूती
शोध के दौरान एफपीए के कणों की सतह रफ और एंगुलर पायी गयी. इससे कण एक-दूसरे के साथ बेहतर तरीके से लॉक हो जाते हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे बैकफिलिंग के बाद भूमिगत क्षेत्र की स्थिरता बढ़ाने में मदद मिल सकती है. दबाव पड़ने की स्थिति में भी एफपीए ने बेहतर प्रतिरोध क्षमता प्रदर्शित की.
प्राकृतिक बालू की खपत होगी कम
शोधकर्ताओं के अनुसार, एफपीए का भविष्य में हाइड्रोलिक स्टोइंग में प्राकृतिक बालू और अनमॉडिफाइड फ्लाई ऐश के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे एक ओर भूमिगत खदानों में बैकफिलिंग के लिए प्राकृतिक बालू की खपत कम होगी, वहीं दूसरी ओर फ्लाई ऐश और प्लास्टिक वेस्ट के उपयोग का रास्ता खुलेगा.
वेस्ट को संसाधन में बदलने का प्रयास
प्रो. भंवर सिंह चौधरी ने कहा कि शोध का उद्देश्य वेस्ट को बोझ के बजाय सस्टेनेबल माइनिंग के लिए उपयोगी संसाधन में बदलना है. फ्लाई ऐश और प्लास्टिक वेस्ट से तैयार यह मटेरियल पर्यावरणीय चुनौतियों को कम करने के साथ खनन क्षेत्र में टिकाऊ बैकफिलिंग के लिए उपयोगी विकल्प बन सकता है.
