जोरी से अभिमन्यु सिंह की रिपोर्ट
जोरी (चतरा). वशिष्ठ नगर तथा प्रतापपुर थाना क्षेत्र की सीमा पर स्थित तेतरिया मोड़ एवं सिजुआ के 100 घरों में रहने वाले अनुसूचित जाति (तुरी) के परिवार आज भी जंगली बांस से बने सामानों को बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं. सुबह उठकर जंगल जाना, जंगल से बांस लाना और बांस को फाड़ कर टोकरी, सूप, दौरा, खचिया, पंखा, चटाई, गंझारा आदि बनाना और उसे स्थानीय साप्ताहिक हाटों में बेचना उनकी दिनचर्या में शामिल है.
बांस के सामान बेचकर चलता है परिवार
बाजार में बेचने के बाद मिले पैसे से ही अपने तथा अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. उनके इस कार्य में महिला सदस्यों की भी पूरी भागीदारी होती है. अनुसूचित जाति में शामिल तुरी समुदाय के लोग काफी मेहनतकश होते हैं.
जंगल-पहाड़ के किनारे बसे हैं तुरी परिवार
इस समुदाय के लोग छोटे-छोटे समूह में बंट कर जंगल तथा पहाड़ के किनारे बसे हुए होते हैं, जहां इन्हें आसानी से बांस की उपलब्धता हो जाती है. आजादी के 80 वर्ष बाद भी इनके जीवन शैली में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. हालांकि नई पीढ़ी के युवक पैसे कमाने के लालच में अन्य प्रदेशों में भी जाना आरंभ कर दिया है, लेकिन इनकी संख्या अभी भी नाम मात्र की है.
ग्रामीणों का दावा- जंगल से बांस लाने पर वन विभाग के लोग करते हैं परेशान
गांव के वासुदेव तुरी, बागेश्वर तुरी, गरीबन तुरी, राधे तुरी, जगन तुरी, घुमल तुरी, प्रेमन तुरी, कामेश्वर तुरी, चंदर तुरी, सुंदरी देवी, मनी देवी और कालिया देवी ने बताया कि जंगल से बांस लाने के दौरान वन विभाग के लोग तंग करते हैं. रोक कर टांगी भी छीन लेते हैं, साथ ही पैसे की मांग करते हैं. पहले जंगल से बांस लाने में किसी तरह की परेशानी नहीं होती थी, वन विभाग के लोग भी परेशान नहीं करते थे.
कच्चे घरों में रहने को मजबूर
इस गांव में रहने वाले तुरी समुदाय के अधिकांश लोगों का मिट्टी तथा खपड़ा से बना कच्चा घर है. बरसात में इन घरों में बारिश का पानी गिरने से रहने में कठिनाई होती है. मात्र 5 से 7 व्यक्ति को ही पक्का आवास मुहैया कराया गया है.
पक्के आवास के लिए पैसे मांगने का लगाया आरोप
पक्का आवास की मांग किए जाने पर पंचायत के मुखिया तथा अन्य सरकारी अधिकारी अपने आदमियों से पैसे की मांग करते हैं. पैसा नहीं रहने के कारण सरकार से मिलने वाली सुविधा का लाभ से हम लोग वंचित हैं.
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