चतरा से दीनबंधू की रिपोर्ट
Chatra News: झारखंड के चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड स्थित हेडूम गांव सांप्रदायिक सौहार्द की ऐसी मिसाल पेश करता है, जिसकी चर्चा पूरे इलाके में होती है. गांव का एक हिंदू परिवार पिछले करीब 72 वर्षों से मोहर्रम का पर्व पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ मनाता आ रहा है. इस परिवार के सदस्य न केवल ताजिया बनाते हैं, बल्कि मोहर्रम के अवसर पर ताजिया जुलूस भी निकालते हैं. परिवार के कुछ सदस्य रमजान के दौरान रोजे भी रखते हैं. इस परंपरा में गांव के सभी समुदायों के लोग सहयोग करते हैं और पूरे आयोजन को मिल-जुलकर संपन्न कराते हैं.
अपने हाथों से बनाते हैं ताजिया
मोहर्रम के अवसर पर परिवार के सदस्य स्वयं ताजिया तैयार करते हैं. इसके बाद गाजे-बाजे और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ पूरे गांव में जुलूस निकाला जाता है. जुलूस कल्याणपुर मोड़ के पास स्थित स्वर्गीय रामदेव सिंह भोक्ता मैदान पहुंचता है, जहां हर वर्ष मेले का आयोजन किया जाता है. इस मेले में हेडूम गांव के अलावा आसपास के कई गांवों से भी लोग पहुंचते हैं. मेले के दौरान युवा पारंपरिक युद्धक कलाओं का प्रदर्शन करते हैं. लाठी, डंडा और तलवार के साथ हैरतअंगेज करतब दिखाए जाते हैं, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं. आयोजन में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं.
पैकाह बनकर अमन और शांति का संदेश देते हैं युवक
परिवार के सदस्य और गांव के हिंदू युवक मोहर्रम के दौरान पैकाह भी बनते हैं. वे कमर में घंटियां बांधते हैं और हाथ में मोर पंख लेकर आसपास के गांवों का भ्रमण करते हैं. इस दौरान क्षेत्र में अमन, शांति और भाईचारे की कामना करते हैं. छोटे-छोटे बच्चे भी इस परंपरा में पूरे उत्साह के साथ शामिल होते हैं. गांव के लोग बताते हैं कि वर्षों से यह आयोजन बिना किसी भेदभाव के होता आ रहा है और सभी जातियों के लोग इसमें सहयोग करते हैं.
लोकआस्था से जुड़ी है परंपरा की शुरुआत
मोहर्रम मनाने वाले कामाख्या सिंह भोक्ता बताते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहा है. उनके अनुसार, इसकी शुरुआत उनके दादा बंधु गंझू ने की थी. बाद में उनके पिता जुगती गंझू ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और अब वे स्वयं इसे निभा रहे हैं. कामाख्या सिंह भोक्ता ने बताया कि परिवार में प्रचलित मान्यता के अनुसार, उनके पिता के जन्म से पहले परिवार में होने वाले बच्चों की असमय मृत्यु हो जाती थी. इस कारण उनके दादा बेहद दुखी रहते थे. परिवार की मान्यता है कि एक दिन गांव छोड़ने के दौरान उनकी मुलाकात एक फकीर से हुई, जिसने उन्हें मोहर्रम मनाने की सलाह दी. परिवार का विश्वास है कि इसके बाद उनके जीवन में खुशहाली आई और परिवार का विस्तार हुआ. इसी आस्था के कारण आज भी पूरा परिवार इस परंपरा का पालन करता है. वर्तमान में उनके परिवार में लगभग 80 सदस्य हैं.
एक ही परिसर में मंदिर और मस्जिद
हेडूम गांव का यह परिवार धार्मिक सद्भाव का एक और अनूठा उदाहरण पेश करता है. कामाख्या सिंह भोक्ता के घर के परिसर में एक ओर मंदिर बना हुआ है तो दूसरी ओर मस्जिद का निर्माण किया गया है. मंदिर में नियमित रूप से पूजा और आरती होती है, जबकि मस्जिद में नमाज अदा की जाती है. स्थानीय लोग इसे हिंदू-मुस्लिम एकता और पारस्परिक सम्मान का प्रतीक मानते हैं.
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गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं
दिलचस्प बात यह है कि हेडूम गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता. गांव की करीब एक हजार की आबादी में गंझू, रविदास, बनिया, लोहार और तुरी समाज के लोग निवास करते हैं. इसके बावजूद गांव में दशकों से मोहर्रम की परंपरा निभाई जा रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, आपसी विश्वास और सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बन चुका है. यही वजह है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में आसपास के गांवों के लोग भी इस आयोजन में शामिल होकर भाईचारे का संदेश देते हैं.
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