Chaibasa News : गोमो-आद्रा पैसेंजर की लेटलतीफी से यात्री परेशान

एक दिसंबर को 6.5 घंटे देर से पहुंची ट्रेन, रातभर ठंड में कांपते रहे यात्री

चक्रधरपुर.

चक्रधरपुर रेल मंडल के यात्री ट्रेनों की लेटलतीफी से परेशान हैं. ट्रेनों की घंटों देर से चलने के कारण अब बड़ी संख्या में लोग रेलयात्रा से किनारा कर रहे हैं. जिनके पास निजी साधन है वे उसका उपयोग कर यात्रा कर रहे हैं. पर गरीब तबके के लोग ट्रेनों पर ही निर्भर हैं. सबसे अधिक परेशान करने वाली स्थिति गोमो-चक्रधरपुर-आद्रा पैसेंजर (ट्रेन संख्या 18115) की है, जो गोमो से चक्रधरपुर के बीच चलती है. यह ट्रेन हजारों दैनिक यात्रियों का सहारा है. कोरोना काल में इस ट्रेन का किराया एक्सप्रेस के बराबर कर दिया गया, पर सुविधाओं में बढ़ोतरी तो दूर, हालात और बदतर हो गये. 1 दिसंबर को यह ट्रेन गोमो से निर्धारित समय 6:35 बजे शाम की जगह 7:00 बजे खुली. इसे रात 11:00 बजे तक चक्रधरपुर पहुंचना था, पर यह सुबह 5:30 बजे पहुंची. यानी पूरे 6.5 घंटे देर से पहुंची. सबसे विचित्र बात यह रही कि आद्रा से चांडिल तक यह ट्रेन केवल 30 मिनट लेट थी. पर चांडिल के बाद हालात बेकाबू हो गये. रात 9:30 बजे चांडिल पहुंचने के बाद चक्रधरपुर तक की मात्र दो घंटे की दूरी तय करने में ट्रेन को आठ घंटे लग गये.

छह किलोमीटर की दूरी डेढ़ घंटे में तय की :

चांडिल से मानीकुई की दूरी केवल छह किमी है. इसे तय करने में इस ट्रेन ने डेढ़ घंटा लगा दी. छोटे-छोटे स्टेशनों पर यह ट्रेन घंटों रुकी रही. इस ट्रेन में सुरक्षा बल की तैनाती नहीं थी. यह स्थिति तब है जब पहले भी इस ट्रेन में कई बार डकैतियां हो चुकी हैं.

ट्रेनों के समयपालन पर सख्त कार्रवाई हो : यात्री

दैनिक यात्रियों का कहना है कि ट्रेनों को समय पर चलाने के लिए रेलवे को ठोस कदम उठाने की जरूरत है. मेमू ट्रेन में शौचालय की सुविधा बहाल हो. रात में सुरक्षा बलों की तैनाती की जाये. छोटे स्टेशनों के यात्रियों के लिए वैकल्पिक इंतजाम किए जायें. यात्रियों का यह भी कहना है कि यदि व्यवस्था जल्द नहीं सुधरी तो वे विरोध-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे.

ट्रेन में शौचालय तक की व्यवस्था नहीं :

यह एक मेमू ट्रेन है. इसमें शौचालय भी नहीं है. खुली खिड़कियों से आती जाड़े की सर्द हवा में गरीब यात्री ठिठुरते रहे. गाड़ी जहां-तहां रुकी. पूरी रात ठंड में बैठे रहने से महिलाएं, बुजुर्गों और बच्चों की हालत दयनीय हो गयी. छोटे स्टेशनों के यात्रियों की सबसे बड़ी समस्या यह रही कि ट्रेन पहुंचने के बाद यात्रियों को ऑटो या टोटो नहीं मिली.

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Author: ATUL PATHAK

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