क्या है पैक्स सिलिका, जिसपर हस्ताक्षर करके भारत नयी टेक व्यवस्था का हिस्सा बना

Pax Silica : भारत ने नयी तकनीकों को साझा करने के मंच पर देर से एंट्री ली है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि नवीनतम तकनीकों की सप्लाई चेन में भारत केंद्रीय भूमिका निभा सकता है. एआई और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में सहयोग से  भारत को काफी फायदा हो सकता है खास कर सुरक्षा से जुड़े मामलों में यह बहुत खास हो सकता है.

Pax Silica : भारत में आयोजित एआई समिट के पांचवें और अंतिम दिन भारत ने Pax Silica घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए. भारत इस समझौते का हिस्सा देर से बना है,लेकिन इस समझौते का हिस्सा बनकर भारत ने नई टेक विश्व-व्यवस्था में कदम रख दिया है. आइए समझते हैं क्या है पैक्स सिलिका (Pax Silica).

क्या है पैक्स सिलिका?

पैक्स सिलिका एक ऐसा मंच है जहां भविष्य की तकनीकों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद सप्लाई चेन बनाया जा रहा है. इसका उद्देश्य तकनीक के क्षेत्र में किसी भी एक देश पर निर्भरता कम करना है. पैक्स सिलिका के सदस्य देश आपस में जुड़कर एआई और अन्य आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाते हैं. इनमें प्रमुख हैं महत्वपूर्ण खनिज-

  • सेमीकंडक्टर चिप
  • डेटा सेंटर
  • डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर

पैक्स सिलिका का उद्देश्य क्या है?

पैक्स सिलिका मंच की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि आज के दौर में तकनीक से जुड़े कच्चे माल और इलेक्ट्राॅनिक्स निर्माण के क्षेत्र में चीन का एकाधिकार है. ऐसी स्थिति में अगर चीन सप्लाई बंद कर दे, तो स्थिति गंभीर हो सकती है और नयी तकनीक पर आफत आ सकती है. इसी स्थिति से बचने के लिए अमेरिका ने पैक्स सिलिका मंच का निर्माण करवाया है.

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कैसे काम करता है पैक्स सिलिका?

पैक्स सिलिका दोस्तों का मंच है, जहां इसके सदस्य राष्ट्र आपस में सहयोग करके नयी तकनीकों को एक दूसरे के साथ शेयर करते हैं. इसमें ज्वाइंट प्रोजेक्ट बनाए जाते हैं और उन्हें आपस में शेयर किया जाता है.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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