चाईबासा: झारखंड के नक्सल प्रभावित कोल्हान और पोड़ाहाट जंगलों में 10 लाख रुपये के इनामी माओवादी जोनल कमांडर सालुका कायम लंबे समय तक आतंक का पर्याय रहा. उसका आत्मसमर्पण भाकपा (माओवादी) संगठन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. मूल रूप से सोनुवा के कुदाबुरु गांव का रहने वाला सालुका लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की हिट लिस्ट में था.
दरअसल, दूसरे राज्यों से आने वाले माओवादी शीर्ष नेताओं (जैसे मिसिर बेसरा और अनल दा) के लिए सालुका कायम पोड़ाहाट और सारंडा के दुर्गम जंगलों की सबसे मजबूत ढाल था. स्थानीय भाषाओं पर पकड़ और जंगलों की भौगोलिक स्थिति की गहरी समझ के कारण वह संगठन के लिए लोकल नेटवर्क मैनेजर की भूमिका निभाता था.
अय्याश व महंगे चीजों का शौकीन है सालुका
जंगलों और भूमिगत जीवन में रहने के बावजूद सालुका की जीवनशैली आम माओवादी कैडरों से काफी अलग और अय्याश मानी जाती थी. उसे विदेशी शराब, ब्रांडेड कपड़े, महंगे जूते और काजू जैसे विशेष खाद्य पदार्थों का बेहद शौक है. उसके दस्ते में हमेशा महिला कैडर मौजूद रहती थीं, जिनमें से कुछ को वह अपनी सुरक्षा के घेरे में रखता था.
लगातार ऑपरेशन से 9 सदस्यीय दस्ता में मात्र 3 बच गये थे
वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में सालुका 9 सशस्त्र माओवादियों के साथ सारंडा से पोड़ाहाट के जंगलों में दाखिल हुआ था. सुरक्षा बलों के ऑपरेशन मेघाबुरु और ऑपरेशन ऑक्टोपस के भारी दबाव के बाद उसका साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह बिखर गया. सबसे पहले उसके 4 साथियों ने सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के चलते साथ छोड़ दिया और आत्मसमर्पण कर दिया. इसके बाद उसके दस्ते में शामिल छत्तीसगढ़ मूल के दो अन्य कैडर भी जंगल की बदहाली और भुखमरी से तंग आकर भाग निकले. उसके पास केवल नाममात्र के साथी बचे थे.
पुलिस की घेराबंदी में कई बार बचकर निकल गया था
इसके पहले सुरक्षा बलों की घेराबंदी के दौरान वह बाल-बाल बचा था. एक बार जब 9 माओवादी एक ग्रामीण के घर में छिपे थे, तब वह ऐन वक्त पर फरार हो गया था. दूसरी बार पुलिस ने उसके शराब पीने के गुप्त ठिकाने पर दबिश दी थी, तब भी वह घने जंगलों की आड़ लेकर भागने में सफल रहा था. आखिरकार, पुलिस और सुरक्षा बलों के चौतरफा दबाव के आगे उसे आत्मसमर्पण करना ही पड़ा.
रांची में 16 नक्सलियों ने किया था सरेंडर
28 जुलाई को रांची स्थित झारखंड पुलिस मुख्यालय में डीजीपी तदाशा मिश्र के समक्ष 16 नक्सलियों (11 पुरुष व पांच महिलाएं) ने आत्मसमर्पण किया था. इनमें से 14 नक्सली कोल्हान सारंडा क्षेत्र से और 2 लातेहार से थे. इनमें 15 लाख रूपये का इनामी रीजनल कमांडर संतोष उर्फ बासुदेव दा सहित कई जोनल और एरिया कमांडर शामिल थे.
प्रेशर आइइडी और स्पाइक होल्स का जाल बिछाने में था माहिर
जंगलों के भीतर भोजन, राशन की सप्लाई से लेकर सुरक्षा बलों की गतिविधियों की रेकी करने तक का पूरा ताना-बाना वही संभालता था. पोड़ाहाट और कोल्हान के जंगलों में सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने के लिए प्रेशर आइइडी और स्पाइक होल्स का खतरनाक जाल बिछाने में भी उसकी मुख्य भूमिका रही थी.
लांजी पहाड़ी विस्फोट में था शामिल
सालुका के आतंक का दायरा काफी बड़ा था. 4 मार्च, 2021 को हुए लांजी पहाड़ी आइइडी विस्फोट में उसका नाम प्रमुखता से आया था. घटना में झारखंड के तीन जवान शहीद हो गये थे. इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) कर रही है.
जेल से भाग चुका है सालुका
सालुका पूर्व में एक बार पुलिस की गिरफ्त में आ गया था. हालांकि, जेल की सुरक्षा को चकमा देकर फरार हो गया था. जेल से भागने के बाद वह दोबारा संगठन में सक्रिय हुआ. अत्याधुनिक एके-47 राइफल से लैस होकर क्षेत्र के ठेकेदारों, लीज होल्डरों और स्थानीय व्यापारियों से भारी मात्रा में लेवी वसूल कर अपना दस्ता चला रहा था.
सुरक्षा बलों के अभियान से ढहा नक्सलियों का किला
दशकों तक नक्सलियों का गढ़ रहा झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम जिला अब नक्सलमुक्ति की अंतिम दहलीज पर पहुंच चुका है. सुरक्षा बलों के निरंतर अभियानों से माओवादियों का सफाया लगभग पूरा हो चुका है. जल्द ही इसकी आधिकारिक घोषणा हो सकती है.
ऐसे मिली सफलता
1 करोड़ के इनामी ''अनल'' सहित कई हार्डकोर कमांडर मारे जा चुके हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं. तिरिलपोसी, कुइड़ा और थोलकोबाद जैसे अति-संवेदनशील इलाकों में नये पुलिस व सीआरपीएफ कैंप स्थापित किये गये हैं. ड्रोन, सैटेलाइट ट्रैकिंग और संयुक्त अभियानों (सीआरपीएफ, कोबरा, जगुआर) की मदद से नक्सलियों का नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त किया गया. जंगलों में बचे-कूचे आइइडी को हटाने का कार्य सतर्कता से चल रहा है, जिसके बाद जिले को आधिकारिक रूप से नक्सलमुक्त घोषित किया जा सकता है.
