Bokaro News : राकेश वर्मा, उदय गिरि, बेरमो. झारखंड की धरती खनिज संपदा से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि यहां की धरती पर कई प्रतिभा संपन्न कलाकार भी बसते हैं. उन्हीं में से एक थे खोरठा जगत में चर्चित लोकगायक व साहित्यकार स्व सुकुमार. झारखंड की लोकभाषा, लोकसंस्कृति और खोरठा साहित्य को अपनी लेखनी और आवाज से नयी पहचान दिलाने वाले साहित्यकार सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ आखिरकार जिंदगी की जंग हार गये. विडंबना यह रही कि जिनकी रचनाएं विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं, जिनके गीतों पर पूरा झारखंड झूमता रहा, वहीं साहित्यकार इलाज के लिए आर्थिक तंगी से जूझते रहे और अंततः समुचित इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया. साहित्य जगत से जुड़े लोग कहते हैं कि सुकुमार का निधन सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि खोरठा साहित्य और झारखंडी संस्कृति की एक जीवंत धरोहर का टूट जाना है. सुकुमार ने झारखंड की मूल भाषा खोरठा के क्षेत्र में आकाशवाणी व दूरदर्शन तक का सफर तय करते हुए पूरे प्रदेश में अपनी पहचान बनायी थी और खोरठा रत्न से सम्मानित हुए. साथ ही इनके द्वारा लिखित खोरठा नाटक ‘डाह’ रांची व हजारीबाग विश्वविद्यालय में इंटर व डिग्री स्तर के पाठ्यक्रमों में शामिल है.
कई नाटक व काव्य संग्रह की रचना की :
उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के बोकारो जिले के नावाडीह प्रखंड के भेंडरा गांव में राधा देवी व विश्वनाथ विश्वकर्मा के घर दो नवंबर 1956 को जन्मे सुकुमार गुदड़ी के लाल थे. हाइस्कूल तक की शिक्षा तो उन्होंने अपने गांव के राज्य संपोषित उच्च विद्यालय में प्राप्त की और 1972 में मैट्रिक की परीक्षा पास की. उसके बाद धनबाद से आइटीआइ व हजारीबाग से डिग्री करने के बाद इनका झुकाव संगीत व साहित्य के प्रति बढ़ा. 1980 में गांव की सामाजिक संस्था नवीन बाल समिति के सचिव बने और आसपास के गांवों में मंचित होने वाले नाटकों में अभिनय कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करना शुरू किया. इनका पहला नाटक ‘हरिश्चंद्र तारामति’ उर्मिला प्रकाशन, भागलपुर से प्रकाशित हुआ. इसके बाद ‘ज्वाला दहेज की’ ,‘दो भाई’ एवं ‘सिकंदर-ए-आजम’ हिंदी नाटक के अलावा लघु खंडकाव्य ‘लालचंद चरित मानस’, खोरठा नाटक ‘डाह’, खोरठा गीत ‘पइनसोखा’, ‘सेवाती’, ‘झीगूर’ एवं ‘मदनभेरी’ के साथ-साथ खोरठा काव्य संग्रह ‘बांवा हाथके रतन’ व ‘नावाडहर’ प्रकाशित हुए.
कई बार हो चुके हैं सम्मानित :
गायन व अभिनय के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा के बल पर आकाशवाणी व दूरदर्शन तक का सफर कर बी हाइ ग्रेड के लोक कलाकार के रूप में स्थापित होने के बादसुकुमार द्वारा रचित खोरठा ऑडियो कैसेट ‘पिरित के मरम,’ ’प्रिया रसिकवा’ ,’फुलवा रानी’ व ‘परीछडहर’ ने प्रदेश में खूब धूम मचाया. बोकारो, धनबाद ,कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग आदि जिलों में इनकी खूब मांग हुई. 1993 में बोकारो की अग्रणी संस्था ‘खोरठा कमेटी’ द्वारा सुकुमार को झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने खोरठा रत्न उपाधि देकर सम्मानित किया. 1997 में पटना में हुए युवा सांस्कृतिक महोत्सव में भी सुकुमार सम्मानित किये गये. 2006 में रांची की संस्था ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ द्वारा अखड़ा सम्मान ,15 अगस्त 2007 को कला संस्कृति खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग, झारखंड सरकार द्वारा राज्य स्तरीय खोरठा सम्मान ,वर्ष 2023 में झारखंड साहित्य अकादमी स्थापना संघर्ष समिति द्वारा उन्हें ‘श्रीनिवास पानुरी स्मृति सम्मान’ प्रदान किया गया. रामगढ़ में एक कार्यक्रम में इनके गाये खोरठा गीत ‘कि दुखे तो राखी लोर गे धनी…’ पर डॉ रामदयाल मुंडा ने अपने गले से माला उतार कर पहनाया व गले लगा लिया. बेरमो की सामाजिक संस्था ‘शोषित मुक्ति वाहिनी’ द्वारा परम वीर अब्दुल हमीद सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया.
गीतों से झूमता रहा झारखंड :
सुकुमार सिर्फ लेखक ही नहीं, बल्कि बेहतरीन गायक और लोक कलाकार भी थे. उनके खोरठा गीतों ने गांव से लेकर शहर तक अलग पहचान बनायी. ‘अखरे गहदम झूमर लागे रे..,’ ‘माय गो, एगो भारत माय…” और ‘कते सुंदर हमारे छोटा नागपुर…’ जैसे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं. उनकी मधुर आवाज और प्रस्तुति शैली के कारण खोरठा जगत में उन्हें प्रेम से ‘स्वर कोकिल’ कहा जाता था.दूरदर्शन और रेडियो के माध्यम से उन्होंने झारखंडी लोकभाषा और संस्कृति को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया. मांदर, बांसुरी और लोकधुनों से सजी उनकी रचनाएं आज भी झारखंडी अस्मिता की पहचान मानी जाती हैं.
‘खोरठा साहित्य के भिखारी ठाकुर’ कहलाये :
नावाडीह के शिक्षक सह साहित्यकार शिरोमणि महतो ने एक कार्यक्रम में सुकुमार को “खोरठा साहित्य का भिखारी ठाकुर” कहा था. यह उपाधि इतनी चर्चित हुई कि वर्ष 2015-16 में जेपीएससी परीक्षा में सवाल पूछा गया -‘खोरठा साहित्य का भिखारी ठाकुर किसे कहा जाता है? जिसका उत्तर था-सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’. उन्होंने खोरठा साहित्य और लोकसंस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने में असाधारण भूमिका निभाई.
सम्मान बहुत मिले, सहारा नहीं :
साहित्यकार शिरोमणि महतो बताते है कि सुकुमार को स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक दर्जनों पुरस्कार और सम्मान मिले. वर्ष 1993 में खोरठा साहित्य परिषद बोकारो के कार्यक्रम में तत्कालीन झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता शिबू सोरेन ने उन्हें ‘खोरठा रत्न’ सम्मान से सम्मानित किया था.वहीं वर्ष 2023 में झारखंड साहित्य अकादमी स्थापना संघर्ष समिति द्वारा उन्हें“श्रीनिवास पानुरी स्मृति सम्मान’ प्रदान किया गया. रामगढ़ में एक कार्यक्रम में इनके गाये खोरठा गीत ‘कि दुखे तो राखी लोर गे धनी…’ पर डॉ रामदयाल मुंडा ने अपने गले से माला उतारकर पहनाया व गले लगा लिया. सम्मानों की लंबी सूची होने के बावजूद जिंदगी के अंतिम दौर में वे आर्थिक तंगी और बीमारी से जूझते रहे. बहरहाल सुकुमार की आवाज भले अब खामोश हो गई हो, लेकिन उनके गीत, नाटक और साहित्य हमेशा झारखंड की माटी में गूंजते रहेंगे.
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