Bokaro News: कहीं 400 तो कहीं 250 वर्षों से हो रही पूजा-अर्चना
ब्रह्मदेव दुबे, पिंड्राजोरा, पिंड्राजोरा क्षेत्र के नारायणपुर पंचायत अंतर्गत जरुवाटांड़ बूढ़ा बाबा धाम व तुरीडीह पंचायत के महुदा गांव के शिवालय में स्वयंभू भगवान शिव विराजमान हैं. जनश्रुति के अनुसार दोनों गांव में भगवान भोलेनाथ पृथ्वी से स्वयं प्रकट हुए हैं . बताया जाता है कि चास प्रखंड के जरुवाटांड़ बूढ़ा बाबा धाम का इतिहास 17 वीं सदी का है. मान्यता है कि एक लोहार की वजह से इस पवित्र स्थल के बारे में लोगों को लगभग 400 साल पूर्व पता चला था. आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व स्वर्गीय वृंदावन तिवारी की अगुवाई में तिवारी परिवार सहित अन्य लोगों की ओर से मंदिर का निर्माण किया गया. जरुवाटांड़ मंदिर अपने मनोकामना शिवलिंग के लिए चर्चित है.
क्या है मान्यता
जरुवाटांड़ बूढ़ा बाबा धाम वेलफेयर न्यास समिति ट्रस्ट के अध्यक्ष मनोरंजन तिवारी सहित मंदिर के पुजारी सच्चिदानंद तिवारी, वनमाली तिवारी, महावीर तिवारी, सुनील तिवारी, गिरिजा प्रसाद तिवारी, सुदामा तिवारी, दुर्गा दास पुजारी व अन्य ने बताया कि एक लोहार शिवलिंग को पत्थर समझकर इसी पर औजार तेज कर रहा था. पत्थर पर लगातार रगड़ पड़ने से अचानक दूध की धारा फूट पड़ी. दूध की धारा इतनी तेज थी कि सामने स्थित तालाब मिनटों में भर गया. जो आज दूधीगोड़िया के नाम से प्रसिद्ध है. कुछ दिनों बाद काशीपुर के राजा को भगवान शिव ने सपने में दर्शन दिया. इसके बाद राजा ने बनारस से पंडित बुलाकर यहां पर पूजा-अर्चना शुरू कराई और पुजारी के रूप में तिवारी परिवार के पूर्वज को जमीन संपत्ति देकर राजा ने बाबा की पूजा अर्चना के लिए रखा. तभी से बूढ़ा बाबा मंदिर में भगवान शंकर की पूजा आराधना हो रही है. शिवरात्रि पर प्रत्येक वर्ष हरि नाम संकीर्तन का आयोजन किया जाता है. वहीं दूसरी ओर महुदा स्थित स्वयंभू शिवलिंग का भी इतिहास अनोखा है. ग्रामीण रामचंद्र सिंह, जगत महतो, नेपाल महतो, परशुराम सिंह, सुनील सिंह, भुवन सिंह, गिरधारी सिंह, शंकर प्रसाद सिंह व अन्य ने बताया कि आज से लगभग 250 वर्ष पूर्व महुदा गांव के समक्ष जंगल में शंभू भगवान भोलेनाथ प्रकट हुए थे. ग्रामीणों का कहना है कि गांव में एक ब्राह्मण रहता था. उनके पास एक गाय थी, जिसे चरवाहा रोज चराने जंगल की ओर ले जाता था. गाय घर में दूध नहीं देती थी, ब्राह्मण को चरवाहा के ऊपर शक हुआ कि बाहर में गाय का दूध निकाल कर पी जाता है. इसी को लेकर ब्राह्मण एवं ग्रामीण एक दिन चरवाहा व गाय के पीछे चल पड़े. जब वह सामने जंगल पहुंचे, तो देखा कि गाय जंगल के एक झुंड में चुपचाप खड़ी है दूध अपने आप निकल रहा है. यह देख सभी आश्चर्य हो गये और उस जगह की खुदाई शुरू कर दी. लगभग 20 फीट तक उस जगह की खुदाई की गयी, लेकिन पत्थर का अंत नहीं पाया गया. उसके बाद ब्राह्मण को भगवान शिव द्वारा स्वप्न दिया गया कि जंगल में जिस जगह खुदाई की गयी है वहां में स्वयं विराजमान हूं, तभी से वहां पूजा अर्चना शुरू हो गयी. आज जो यहां भी मनोकामना लेकर आता है, उसकी मनोकामना पूर्ण होती है.
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