Bokaro News : दो लाख टन लक्ष्य, अब तक मात्र 60407 क्विंटल हुई धान की खरीदारी

Bokaro News : चार साल से बोकारो लक्ष्य को नहीं कर पाया है प्राप्त, पिछले चार साल से बोकारो जिला ने धान अधिप्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है. लक्ष्य पूर्ण तो दूर की बात, एक साल को छोड़ दें तो लक्ष्य के आसपास भी नहीं भटका है.

बोकारो, लक्ष्य प्राप्त करना उपलब्धि माना जाता है, लेकिन बोकारो ने इस उपलब्धि को ज्यादा सीरियस लेने की दिशा में कदम नहीं बढ़ाने को नियति मान लिया है. कम से कम धान खरीदारी मामले में ऐसा ही दिख रहा है. मौजूदा वित्तीय वर्ष 2024-25 में जिला को दो लाख क्विंटल धान खरीदारी का लक्ष्य दिया गया था, लेकिन, जिला 60407.49 क्विंटल धान ही खरीद सका. बता दें कि पिछले चार साल से बोकारो जिला ने धान अधिप्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है. लक्ष्य पूर्ण तो दूर की बात, एक साल को छोड़ दें तो लक्ष्य के आसपास भी नहीं भटका है.

2021-22 में पहुंचे थे लक्ष्य के करीब

जिला के लिए 2021-22 उपलब्धि जैसा रहा. उक्त वित्तीय वर्ष में जिला ने दा लाख क्विंटल धान अधिप्राप्ति के लक्ष्य के विरुद्ध 194111.85 क्विंटल धान की खरीदारी की थी. इस साल 97 प्रतिशत से अधिक लक्ष्य प्राप्त किया गया. इसके बाद बोकारो की स्थिति लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में बद से बदतर हो गयी. 2022-23 में 40939.57 क्विंटल व 2023-24 में 21743.22 क्विंटल धान की अधिप्राप्ति हुई है. यानी लक्ष्य प्राप्ति से जिला कोसों दूर रहा है.

विभागीय लेट लतीफी व किस्तों में भुगतान से बचते हैं किसान

बोकारो जिला में 33 हजार हेक्टेयर में धान की खेती होती है. 2024 में अच्छे मानसून के कारण उत्पादन भी हुआ है. बावजूद इसके जिला धान अधिप्राप्ति के लक्ष्य से पिछड़ रहा है. इसके पीछे का कारण तलाशने पर दो बात सामने आयी. जानकारों की माने तो किसान किसी प्रकार की उलझन में नहीं फंसना चाहते. विभागीय लेट-लतीफी से किसान बचना चाहते हैं. रजिस्ट्रेशन से लेकर धान की बिक्री के प्रोसेस में किसान को परेशानी होती है. इतना ही नहीं धान बिक्री के बाद किस्त में राशि का भुगतान होता है. वहीं अन्य स्रोत से धान की बिक्री करने पर एकमुश्त राशि की प्राप्ति होती है.

खलिहान से बिक्री, विभाग नहीं दे पाता सुविधा

आखिर बोकारो जिला धान अधिप्राप्ति के लक्ष्य को पूरा क्यों नहीं कर पाता. इसकी पड़ताल भी की गयी. किसानों की माने तो सरकार जब धान खरीदारी की प्रक्रिया शुरू करती है, तब तक खुला बाजार में धान की बोली लग चुकी होती है. इतना ही नहीं खुले बाजार के लोग सीधे खलिहान से धान लेकर जाते हैं. जबकि, सरकारी स्तर पर किसान को धान पैक्स या खरीद स्थल तक पहुंचाना होता है. इस झंझट से किसान मुक्त होना चाहते हैं.

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