Bihar Prohibition Success Story: शराबबंदी लागू होने के एक दशक से अधिक समय गुजरने के साथ ही बहुतों की बदहाल जिंदगी अब खुशहाल हुई है. इस सामाजिक बदलाव से सामाजिक जनजीवन में व्यापक परिवर्तन आया है. ग्रामीण परिवेश की बात करें, तो इसका सबसे ज्यादा लाभ घरों की मां-बहनों और बहू-बेटियों को मिला है. शराबबंदी ने न केवल टूटते-बिखरते परिवारों को बचाया है, बल्कि घरेलू हिंसा की शिकार होती रही महिलाओं को भी राहत मिली है. अधूरी परवरिश का दंश झेल रहे समाज के बच्चों की जिंदगी भी पटरी पर आयी है.
नशामुक्ति से बहुत से लोगों की लड़खड़ाती जिंदगी को नया आयाम मिला है और उनमें नयी जिंदगी जीने की तमन्ना जगी है. बहुतों ने शराब से तौबा कर न सिर्फ अपनी बेपटरी हो चुकी जिंदगी को संभाला है, बल्कि अपने परिवार को भी बदहाली से बचाया है. इसका जीता-जागता उदाहरण प्रखंड के सदरपुर निवासी ललन सिंह हैं.
जोरहाट में कपड़ा व्यवसायी थे ललन सिंह
एक दौर था, जब सदरपुर निवासी स्व. चंद्रदेव सिंह के पुत्र ललन सिंह असम के जोरहाट में कपड़ा व्यवसायी के रूप में जाने जाते थे. उनकी पत्नी गीता देवी अपने तीन बच्चों के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही थीं. अच्छी आय के साथ परिवार का जीवन सुखमय चल रहा था और जीविकोपार्जन भी सुदृढ़ तरीके से हो रहा था.
समय ने करवट बदली. कुछ पारिवारिक कारणों से ललन सिंह को अपने गांव आना पड़ा. गांव में नये दोस्त मिले और धीरे-धीरे उन्हें शराब की लत लग गयी. शराब ने सबकुछ तहस-नहस कर दिया. शराब की लत ने पूरे परिवार को गरीबी और बदहाली की ओर धकेल दिया. देखते ही देखते ललन बाबू अब ललनवा हो चुके थे.
शराब की लत ने कारोबार और परिवार को पहुंचाया नुकसान
ललन सिंह का पूरा कारोबार डूबने लगा. आर्थिक तंगी ने उन्हें पूरी तरह तबाह कर दिया. कुछ दिनों बाद वे मानसिक परेशानी के साथ ही अन्य बीमारियों से भी ग्रसित हो गये. शराब के कुप्रभाव से उनका चेहरा भी डरावना हो गया. पिता की दशा देखकर बच्चों की आंखों की चमक गायब हो गयी और उनके सपने टूटने लगे. शांत और संभ्रांत परिवार कलह और निराशा के गर्त में चला गया.
जीविका दीदी की पहल से मिली उम्मीद की किरण
ललन सिंह की सिसकती जिंदगी में आशा की किरण बनकर आयीं शराबबंदी का समर्थन करने वाली परियोजना जीविका की जीविका दीदी मीरा देवी. उन्होंने ललन सिंह की पत्नी गीता देवी को स्वयं सहायता समूह से जोड़ा. इसके बाद उन्हें आर्थिक मदद भी दी गयी.
इधर प्रदेश में शराबबंदी का सकारात्मक प्रभाव चारों ओर दिखने लगा था और सामाजिक परिवेश भी बदल रहा था. महिलाएं शराब के खिलाफ मजबूती से खड़ी हो चुकी थीं. पारिवारिक और सामाजिक दबाव के बीच ललन सिंह ने भी शराब से तौबा कर ली.
किराना दुकान खोलकर परिवार को दे रहे बेहतर जिंदगी
शराब छोड़ने के बाद ललन सिंह की जीवनशैली में बदलाव आया. पत्नी ने भी उनका भरपूर साथ दिया. ललन सिंह ने गांव में ही किराना की दुकान खोल ली. अब वे सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं. किराना दुकान से वे अपने पूरे परिवार का न केवल भरण-पोषण कर रहे हैं, बल्कि बच्चों को अच्छी शिक्षा-दीक्षा भी दे रहे हैं.
ललन सिंह की दम तोड़ती जिंदगी अब फिर से जीवंत हो चुकी है. बच्चों की आंखों की चमक लौट आयी है और वे पढ़-लिखकर कुछ बनने के सपने देख रहे हैं. शराबबंदी ने उनके परिवार को नयी दिशा दी है और उन्हें फिर से सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिला है.
