सीवान : 101 साल पुरानी पत्र-मंजूषा आज भी सुना रही इतिहास की कहानी

सीवान में 101 साल पुरानी पत्र-मंजूषा आज भी डाक विभाग की व्यवस्था और बीते दौर की यादों को संजोए खड़ी है. यह ऐतिहासिक धरोहर न केवल इतिहास का हिस्सा है, बल्कि लोगों की भावनाओं से भी जुड़ी हुई है.

मोबाइल और इंटरनेट के इस दौर में संदेश पलक झपकते ही एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाता है. लेकिन प्रधान डाक घर में 101 साल पुरानी पत्र-मंजूषा आज भी बीते दौर की यादों को संजोए खड़ी है. वर्ष 1925 में स्थापित लाल रंग की यह पत्र-मंजूषा डाक विभाग की पुरानी व्यवस्था और चिट्ठियों के दौर की गवाह है.

डाक विभाग के कार्यालय के सामने स्थित यह हेरिटेज लेटर बॉक्स अब केवल लोहे की एक संरचना नहीं, बल्कि सीवान के इतिहास का हिस्सा बन चुका है. करीब एक सदी से अधिक समय से धूप, बारिश, गर्मी और ठंड झेलते हुए यह अपने मूल स्वरूप में खड़ा है.

कभी इसी पत्र-मंजूषा में डाली गई चिट्ठियां लोगों के सुख-दुख, कुशल-क्षेम और भावनाओं को अपनों तक पहुंचाती थीं. इस धरोहर का संबंध सीवान के ऐतिहासिक जीरादेई से भी जुड़ा है. जीरादेई देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मभूमि है. आजादी के आंदोलन के दौर में संदेशों और सूचनाओं के आदान-प्रदान में डाक व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका थी. ऐसे में यह पत्र-मंजूषा उस समय की संचार व्यवस्था की भी गवाह रही है.

डाक अधीक्षक अभिषेक कुमार सिंह ने बताया कि यह पुरानी पत्र-मंजूषा आज भी अपने मूल स्वरूप में मौजूद है. उन्होंने कहा कि समय के साथ संचार के साधन बदले हैं, लेकिन लोगों को सेवा देने की डाक विभाग की भावना आज भी कायम है. कभी इस पत्र-मंजूषा से गुजरने वाली चिट्ठी किसी मां के लिए बेटे की कुशल-क्षेम लेकर जाती थी तो किसी परिवार के लिए अपनों की खुशियों का संदेश.किसी पत्र में संघर्ष की कहानी होती थी तो किसी में अपनों से मिलने की उम्मीद और इंतजार.

यही वजह है कि यह पत्र-मंजूषा सीवान के लोगों की भावनाओं से भी जुड़ी रही है. आज मोबाइल संदेश और इंटरनेट ने चिट्ठियों की जगह काफी हद तक ले ली है. इसके बावजूद शहर में मौजूद यह 101 साल पुरानी पत्र-मंजूषा इतिहास और वर्तमान के बीच एक मजबूत कड़ी बनी हुई है. यह याद दिलाती है कि तकनीक भले बदल जाए, लेकिन लोगों को जोड़ने वाली भावनाएं कभी पुरानी नहीं होतीं.


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By पंकज कुमार

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