शाहाबाद की आर्द्रभूमि में पहली बार दिखा ब्राउन हेडेड गल

40वीं एशियाई जलपक्षी जनगणना के दौरान देखा गया है दुर्लभ पक्षी

सासाराम ऑफिस़ शाहाबाद की आर्द्रभूमि में पहली बार ब्राउन हेडेड गल देखा गया है. यह दुर्लभ पक्षी रोहतास जिले के करमचट डैम में पहली बार तब देखा गया है, जब शांति प्रसाद जैन कॉलेज सासाराम के जंतु विज्ञान विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ गौरव कुमार के नेतृत्व में टीम एशियाई जलपक्षी जनगणना (एडब्ल्यूसी)-2026 का कार्य कर रही थी. टीम मेंएमएससी के छात्र-छात्राएं प्रियांशु प्रभाकर, लवली कुमारी, मनीष कुमार व रोहित कुमार शामिल थे. डॉ गौरव ने बताया कि ब्राउन हेडेड गल (भूरे सिर वाला गल) एक प्रवासी पक्षी है, जो मध्य एशिया के ऊंचे पठारों पर प्रजनन करता है और सर्दियों में भारतीय उपमहाद्वीप के तटीय इलाकों और झीलों में आता है. यह अपने भूरे सिर, हल्के शरीर, लाल चोंच और पंखों के काले सिरों (विशेषकर सफेद मिरर के साथ) से पहचाना जाता है. यह ब्लैक-हेडेड गल से थोड़ा बड़ा होता है. इसका आवास उच्च-ऊंचाई वाले झीलें (प्रजनन), और सर्दियों में समुद्र तट, ज्वारनदमुख, झीलें और नदियों में (भारत) होती हैं. यह मंगोलिया, ताजिकिस्तान और तिब्बत से भारत जैसे क्षेत्रों में प्रवास करते हैं. उन्होंने बताया कि इस दुर्लभ पक्षी को हाल के दिनों में पटना में रिपोर्ट तो किया गया था. लेकिन, शाहाबाद क्षेत्र में पहली बार आधिकारिक रिकॉर्डिंग किया जा रहा है.

तालाब व नदी के तटीय क्षेत्र अब भी प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल

डॉ गौरव ने कहा कि यह महज एक पक्षी-दर्शन नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय जलाशय, तालाब और नदी तटीय क्षेत्र अब भी प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल बने हुए हैं. यह खोज शाहाबाद के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करता है और संरक्षण की आवश्यकता को और मजबूत बनाती है. यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आयी है जब पूरे एशिया में एशियाई जलपक्षी जनगणना (एडब्ल्यूसी)-2026 चल रही है. वर्ष 2026 इसलिए भी ऐतिहासिक है, क्योंकि यह एडब्ल्यूसी की 40वीं वर्षगांठ और अंतरराष्ट्रीय जलपक्षी जनगणना की 60वीं वर्षगांठ है. ऐसे में शाहाबाद से मिली यह जानकारी राष्ट्रीय व वैश्विक संरक्षण विमर्श को नयी दिशा देती है.

जल पक्षियों की आबादी व आर्द्रभूमियों के स्वास्थ्य का हो रहा वैज्ञानिक आकलन

उन्होंने एडब्ल्यूसी-2026 के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य जनवरी महीने में, यानी प्रजनन काल में बाहर के जल पक्षियों की आबादी और आर्द्रभूमियों के स्वास्थ्य का वैज्ञानिक आकलन करना है. इसके जरिये जल पक्षियों की संख्या में हो रहे बदलावों की निगरानी, संवेदनशील स्थलों की पहचान और संरक्षण प्राथमिकताओं का निर्धारण किया जाता है. यह आंकड़े रामसर, प्रवासी प्रजाति समझौता और जैव विविधता सम्मेलन जैसी अंतरराष्ट्रीय संधियों के लिए भी उपयोगी होते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर यह सर्वे जीरो क्षेत्र में पायी जाने वाली मैंडरिन डक और कोरिंगा में मौजूद गंभीर रूप से संकटग्रस्त इंडियन स्कीमर जैसी प्रजातियों पर निगरानी को भी मजबूत करेगा. शाहाबाद में भूरा सिर वाली काकली की उपस्थिति इस व्यापक संरक्षण अभियान से क्षेत्र को सीधे जोड़ती है.

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Published by: Panchdev kumar

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