समाप्त हो रही परंपराओं के बीच कायम है सोनपुर मेला की भव्यता

विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला, जो कभी एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता था, अब धीरे-धीरे अपने पारंपरिक स्वरूप से बदल रहा है.

सोनपुर. विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला, जो कभी एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता था, अब धीरे-धीरे अपने पारंपरिक स्वरूप से बदल रहा है. पिछले एक दशक में जहां पशुओं की बिक्री में भारी गिरावट आयी है, वहीं सरकारी बंदिशों ने भी इस मेले की रौनक को प्रभावित किया है. इसके बावजूद मेले ने अपना कलेवर इस तरह बदला है कि लाखों की संख्या में लोग अब भी यहां पहुंचते हैं.

दो दशक पहले तक सोनपुर मेला शादी-ब्याह की तैयारियों के लिए सबसे पसंदीदा बाजार था. लोग यहां से कपड़े, गहने, घरेलू सामान और सजावट की वस्तुएं बड़ी संख्या में खरीदते थे. आज भी आसपास के लोग विवाह से जुड़ी खरीदारी के लिए यहां आते हैं, हालांकि समय के साथ यह परंपरा भी धीरे-धीरे बदल रही है. आज सोनपुर मेला में अस्थायी रूप से कई शोरूम बनाए जाते हैं, जहां मोटरसाइकिल से लेकर चार पहिया वाहनों तक की बिक्री होती है. कृषि विभाग द्वारा सब्सिडी पर दिए जाने वाले कृषि यंत्रों की बिक्री का यह अब एक प्रमुख केंद्र बन गया है. वहीं, लकड़ी बाजार की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. अब व्यापारी लोकल से लेकर ब्रांडेड कंपनियों तक के लकड़ी उत्पाद यहां बेचते हैं.

कई परंपराएं अब लुप्त होने के कगार पर

कभी लोग बैलगाड़ी, टमटम और टायरगाड़ी से सोनपुर मेला पहुंचते थे, लेकिन अब पूरा परिसर कीमती गाड़ियों से पट जाता है. लोक नृत्य, गायन और नौटंकी जैसी पारंपरिक कलाएं अब लगभग विलुप्त हो चुकी हैं. कभी मेले की पहचान रही पहलवानी भी अब इतिहास बनती जा रही है. हाथियों की संख्या में भी भारी कमी आयी है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन जलक्रीड़ा का दृश्य अब दुर्लभ हो गया है. जानकार बताते हैं कि पहले लोग कार्तिक पूर्णिमा स्नान के लिए चार-पांच दिन पहले ही बैलगाड़ी से सोनपुर पहुंचते थे. वे अपने साथ खाद्य सामग्री लाते और मेला परिसर में ही भोजन बनाते थे. उस समय मेला में ठहराव और अपनापन होता था, मगर आज का मेला एक वनडे या ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच की तरह हो गया है. लोग आते हैं, घूमते हैं और लौट जाते हैं.

नौटंकी की जगह थिएटरों ने ली, बढ़ी फूहड़ता

एक समय सोनपुर मेला की नौटंकी देश भर में प्रसिद्ध थी. कला का प्रदर्शन होता था, लोकगीत और नाटक होते थे. लेकिन अब नौटंकी का स्थान थिएटरों ने ले लिया है. बड़ी संख्या में युवा थिएटर देखने आते हैं, परंतु इनमें परोसी जा रही फूहड़ता को लेकर स्थानीय लोग असंतोष भी जताते हैं.

स्थानीय मवेशियों तक सीमित रह गया है पशु बाजार

पहले इस मेले में पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल और असम से पशु आते थे. लेकिन 1996-97 के बाद गायों का आना बंद हो गया और 2009 के बाद से भैंसों की बिक्री भी घट गयी. अब यह मेला केवल स्थानीय स्तर के मवेशियों तक सिमट कर रह गया है. इतिहासकार बताते हैं कि हरिहर क्षेत्र का यह प्रसिद्ध मेला पहले हाजीपुर की ओर लगता था. श्रद्धालु बाबा हरिहरनाथ की पूजा के लिए सोनपुर की तरफ आते थे. अंग्रेज अधिकारियों ने खेल मैदान की कमी और घुड़सवारी जैसी गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान मिलने के कारण मेले का स्थल बदल दिया. इसके लिखित प्रमाण भी उपलब्ध हैं.

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Published by: Alok kumar

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