सारण: महापौर को हाईकोर्ट से झटका, छह पार्षदों के निलंबन पर अगली सुनवाई तक रोक; 3 नवंबर को सुनवाई

छपरा नगर निगम के महापौर द्वारा 6 पार्षदों के निलंबन पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक. अगली सुनवाई 3 नवंबर को, 415 करोड़ की विकास योजनाएं अधर में लटकीं.

Saran News : छपरा नगर निगम के महापौर लक्ष्मी नारायण गुप्ता को नगर विकास विभाग के बाद अब हाईकोर्ट से भी झटका लगा है. हाईकोर्ट ने महापौर की ओर से छह पार्षदों को 60 दिनों के लिए निलंबित करने की कार्रवाई पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है. मामले की अगली सुनवाई 3 नवंबर को होगी.

महापौर की इस कार्रवाई को लेकर पहले ही नगर विकास एवं आवास विभाग की ओर से सवाल उठाये गये थे. विभाग के अवर सचिव ने कार्रवाई में बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007 की धारा 52(2) एवं 52(3) के प्रावधानों के पूर्ण अनुपालन को स्पष्ट नहीं मानते हुए महापौर से तीन दिनों के भीतर तथ्यात्मक साक्ष्य मांगा था. इसी बीच निलंबित पार्षदों ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां फिलहाल निलंबन आदेश पर रोक लगा दी गयी है.

22 जुलाई की बोर्ड बैठक के बाद छह पार्षद हुए थे निलंबित

22 जुलाई को निगम बोर्ड की बैठक के बाद महापौर ने छह पार्षदों पर अव्यवस्था उत्पन्न करने, गैर-जिम्मेदाराना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत आचरण करने का आरोप लगाते हुए उन्हें 60 दिनों के लिए निगम की बैठकों से निलंबित कर दिया था. उपमहापौर रागिनी कुमारी और अन्य पार्षदों ने इस कार्रवाई को नियम के विरुद्ध बताते हुए विभाग से हस्तक्षेप की मांग की थी.

नगर विकास विभाग ने भी उठाये थे नियमों पर सवाल

नगर विकास एवं आवास विभाग के अवर सचिव ने अपने आदेश में कहा था कि निलंबन से पहले बिहार नगरपालिका अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया गया या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है. आदेश में यह भी कहा गया था कि पार्षदों को पहले बैठक से हटाये जाने, दोबारा चेतावनी दिये जाने और बार-बार गंभीर अव्यवस्था उत्पन्न करने से संबंधित आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराये गये हैं.

विभाग के अनुसार, किसी पार्षद के निलंबन से पहले अधिनियम में निर्धारित विभिन्न चरणों का पूरा होना आवश्यक है. ऐसे में प्रथम दृष्टया यह कार्रवाई विधिसम्मत प्रतीत नहीं होती है. विभाग ने महापौर से इस संबंध में तथ्यात्मक साक्ष्य मांगा था.

हाईकोर्ट के आदेश से विपक्षी पार्षदों में खुशी

हाईकोर्ट से आदेश आने के बाद उपमहापौर रागिनी कुमारी समेत अन्य पार्षदों ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया है. उनका कहना है कि सदन में अपनी बात रखना हर पार्षद का अधिकार है. इधर, महापौर की ओर से नगर विकास विभाग के आदेश का जवाब तैयार किया जा रहा है. हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार महापौर और नगर आयुक्त की ओर से काउंटर एफिडेविट दाखिल करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गयी है.

महापौर-पार्षद विवाद में 415 करोड़ का बजट अटका

महापौर और पार्षदों के बीच चल रहे विवाद का असर नगर निगम के विकास कार्यों पर भी पड़ रहा है. वर्ष 2026-27 के लिए स्वीकृत करीब 415 करोड़ रुपये के बजट से जुड़ी योजनाओं पर फिलहाल निर्णय नहीं हो पा रहा है. इनमें शहर की सड़क, ड्रेनेज, पार्क, मार्केट, साफ-सफाई समेत डेढ़ सौ से अधिक छोटी-बड़ी योजनाएं शामिल हैं.

नगर निगम से जुड़े लोगों का कहना है कि महापौर और पार्षदों के बीच विवाद का समाधान नहीं होने से विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने में परेशानी हो रही है. ऐसे में अब सभी की नजर हाईकोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई पर है.

क्या बोलीं उपमहापौर

उपमहापौर रागिनी कुमारी ने कहा कि अगर कोई पार्षद अपनी बात सदन में नहीं रखेगा, तो फिर कहां रखेगा. उनके अनुसार महापौर की कार्रवाई लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ थी. उन्होंने कहा कि नगर विकास विभाग के बाद हाईकोर्ट के आदेश से भी यह स्पष्ट हुआ है कि पार्षदों की बात सुनी जानी चाहिए.

रागिनी कुमारी, उपमहापौर. “यह न्याय की जीत और अन्याय की हार है. हमें उम्मीद है कि आगे भी मामले में न्याय मिलेगा.”

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By संजय भारद्वाज

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