सामाजिक सद्भाव की मिसाल थी छपरा की पतंगबाजी
छपरा(नगर) : सर्द हवाओं के बीच सूरज की लुकाछिपी, बादलों से टपकती ओस की बूंदे और घर की छतों व खुले मैदानों में पतंगबाजी करते लोग. 90 के दशक तक पतंगबाजी का क्रेज और इसे लेकर युवाओं में जो उत्साह था आज के दौर में वह लगभग समाप्ति की ओर है. उस दौर में न भूख लगती थी न प्यास, नींद खुलते ही आसमान में अपनी पतंग को सबसे ऊंचा टांगने की लालसा लिये बच्चों और युवाओं के साथ उम्रदराजों का जोश भी परवान चढ़ कर बोलता था. छपरा में कई पुराने मुहल्ले आज भी पतंगबाजी के उस दौर की थोड़ी याद जरूर दिलाते हैं, पर चाइनीज बाजार की चकाचौंध, स्मार्ट फोन का बढ़ता वर्चस्व तथा समय को लेकर शुरू भाग-दौड़ ने पुराने माहौल पर पूर्णविराम लगा दिया है.
एक माह पहले ही शुरू हो जाती पतंगबाजी : कुछ वर्ष पहले तक शहर में मकर संक्रांति के एक पहले से ही पतंगबाजों की शोरगुल शुरू हो जाती थी. तब बाजार में चाइनीज धागे और चाइनीज पतंगे नहीं हुआ करती थी. साबूदाना और अरारोट मिलाकर मांझा तैयार किया जाता था. लैंप व लालटेन के फूटे हुए शीशे को बारीक पीस कर उसमें मिलाया जाता था. शांति ब्रांड के धागे तब मांझे के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते थे. घर की छतों पर दर्जनों लोग एक साथ अपनी लटाई पर मांझा चढ़ाते थे. अलग-अलग रंगों में तैयार मांझे से पतंगों की डोर बंधती थी और एक माह से भी ज्यादा समय तक आसमान रंग-बिरंगे पतंगों से गुलजार रहता था. शहर के दहियांवा, मिशन रोड, जगदम्बा रोड, सोनारपट्टी, रामराज चौक, नई बाजार, सरकारी बाजार, मौना मुहल्ला पतंगबाजी के गढ़ माने जाते थे.
मुहल्ले में शाम को बनती थी योजना
उस दौर की पतंबाजी सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं होती थी. हाथ में पतंग व लटाई लिए जब पतंगबाज अपने छत या मैदान में आते थे तब एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा का भाव रहता था. हर दिन एक नया जोश देखने को मिलता था. शाम के समय चौक-चौराहों पर योजना बनती थी. कौन कितनी पतंगे काटेगा इसे लेकर शर्त लगा करती थी. ग्रुप में भी पतंगबाजी हुआ करती थी. एक छत पर जुटे पतंगबाज दूसरे छत पर खड़े लड़कों से शर्त लगाते थे.
किस छत से कितनी आक्रामक पतंगबाजी होती थी इसे लेकर आस-पास के लोगों में उत्सुकता रहती थी. घर के बुजुर्ग हो या महिलाएं हर कोई रोमांच से भरे पतंगबाजी के दृश्यों को देख आनंद की अनुभूति करता था.
पेट्रोमैक्स जलाकर देर शाम तक होती थी पतंगबाजी
मकर संक्रांति वाले दिन तो पतंगबाजी का उत्साह चरम पर होता था. अमीरी-गरीबी का भेद मिटाकर हर परिवार के युवाओं में पतंग उड़ाने की ललक देखने को मिलती थी. डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, अधिकारी, व्यवसायी, मजदूर, दुकानदार इस रोमांचक पल के साक्षी बनते थे. डॉक्टर साहब की पतंग एक ठेला चलाने वाला मजदूर काट लिया करता था. वहीं स्वर्ण आभूषण के बड़े कारोबारी की पतंग एक साधारण दुकानदार काट कर ले जाता था. हालांकि तब इस प्रतिस्पर्धा के बीच कोई भेदभाव नहीं रहता था. थोड़ी बहुत नोकझोंक के बाद ‘भो काटा’ की चहकती आवाजें माहौल को सुखद बना देती थीं. मकर संक्रांति के दिन दो मुहल्लों के बीच देर रात तक प्रतिस्पर्धा जारी रहती थी. टीन के खाली कनस्टर की आवाज और पेट्रोमैक्स की पीली रोशनी के बीच देर शाम तक इस खास दिन बड़े ही शानदार तरीके से पतंगबाजी हुआ करती थी.
अब नहीं दिखती धमा-चौकड़ी
वक्त के साथ अब पतंगबाजी को लेकर युवाओं और बच्चों में उत्साह नहीं रहा. चाइनीज धागों ने वह देशीपन खत्म कर दिया है. लोगों के पास अब फुर्सत नहीं रही. उम्मीदों को इतने पंख लग गये कि अब रोजी रोजगार की चाव में पतंगबाजी को लेकर वह उत्साह नहीं दिखता. पतंगे उड़नी कम होती गयी. अब न पतंगे कटती हैं और न उसे लूटने की शोर सुनाई पड़ती है. न पतंग उड़ाने वाले जांबाज और न पतंग कटने पर जोर-जोर से चिल्लाने वाले बच्चे. आधुनिकता की चकाचौंध में उम्मीद की उन पतंगों को डोर नहीं मिलती.
