US Iran War Ceasefire : अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के लिए हुए सीजफायर को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है, पर विश्व के नेताओं को इस बात पर भरोसा नहीं हो रहा है कि यह सीजफायर स्थायी शांति लेकर आएगा. दरअसल, 10 अप्रैल से ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता होने वाली है, यह वार्ता कितनी सफल होगी यह तो आने वाला वक्त बताएगा. क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के रवैये पर पूरी दुनिया को भरोसा नहीं है. वहीं मिडिल ईस्ट में शांति कायम करने के लिए सभी पक्षों को शांति के लिए राजी करना होगा और आपसी बातचीत भी बढ़ाना होगा, पर यह एक बहुत बड़ी समस्या है, क्योंकि लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई रोकने को इजरायल तैयार नहीं है.
1. क्या सीजफायर की राह में बाधा है लेबनान?
मंगलवार की रात जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की घोषणा हुई, तो पूरे मिडिल ईस्ट के अलावा विश्व ने भी राहत की सांस ली. लगभग 40 दिन से जारी इस युद्ध के खत्म होने का इंतजार पूरा विश्व कर रहा है, लेकिन इस युद्ध में शामिल पक्ष अपने-अपने हितों को लेकर झुकने के मूड में नहीं हैं. यही वजह है कि इजरायल ने यह साफ कर दिया है कि वह हिजबुल्लाह की समाप्ति के लिए लेबनान के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा. वह यह मानता है कि लेबनान के खिलाफ कार्रवाई इस सीजफायर का हिस्सा नहीं है. हिजबुल्लाह एक ऐसा संगठन है, जो हमेशा ही इजरायल पर हमला करता रहता है. अपनी सीमा को हिजबुल्लाह से सुरक्षित करने के लिए इजरायल, लेबनान के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, क्योंकि लेबनान को हिजबुल्लाह के ठिकानों में से एक माना जा सकता है. हिजबुल्लाह ने इजरायल पर पहले हमला किया था, जिसके जवाब में इजरायल ने भी उस पर हमला शुरू किया था. अब जबकि सीजफायर हो गया है, ईरान चाहता है कि उसके सहयोगियों पर हमले रोके जाएं, लेकिन इजरायल का यह कहना है कि यह सैन्य कार्रवाई अलग है. इससे ईरान युद्ध का कोई संबंध नहीं है. दोनों देशों द्वारा दिये जा रहे तर्क स्थायी सीजफायर की दिशा में बड़ी बाधा साबित हो सकते हैं.
2. क्या हैं सीजफायर की शर्तें
ईरान और अमेरिका के बीच जो सीजफायर हुआ है, वह शर्तों के तहत हुआ है. सीजफायर को स्थायी बनाने के लिए इस्लामाबाद में शांतिवार्ता होगी. ईरान ने अपनी 10-सूत्रीय योजना में पूरे क्षेत्र में हमले रोकने की बात कही है. इसमें उसके सहयोगी समूह भी शामिल हैं. सीजफायर को स्थायी बनाने में सबसे बड़ा पेच यहीं फंसता है, क्योंकि इजरायल, लेबनान पर हमला बंद करने के मूड में बिलकुल भी नहीं है. इजरायल दक्षिणी लेबनान में ग्राउंड ऑपरेशन चला रहा है, ताकि वह अपने लिए एक सुरक्षित क्षेत्र बना सके, जहां हिजबुल्लाह आक्रमण ना कर सके. ईरान की शर्तों की वजह से इससे सीजफायर पर असर पड़ सकता है. होर्मुज स्ट्रेट को ईरान ने अभी तो खोला है, लेकिन वह कबतक इसपर कायम रहेगा, यह कहना मुश्किल है. सीजफायर के लिए होर्मुज स्ट्रेट को खोलना अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त है.
3. ईरान और अमेरिका के बीच विश्वास की कमी
ईरान युद्ध में जो सीजफायर हुआ है, उसमें सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी है. दोनों ही देश एक दूसरे पर भरोसा नहीं करते हैं. युद्ध की शुरुआत में अमेरिका ने यह कहा कि वह आम लोगों को इसमें शामिल नहीं करेगा, लेकिन स्कूल पर हमले हुए और टीचर और बच्चों को मिलाकर 175 लोगों की जान गई. हमले रोकने की बात हुई, लेकिन हमले जारी रहे. इस तरह की कार्रवाइयों की वजह से दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी है. शांति वार्ता के दौरान दोनों का पक्षों का भरोसा काफी अहम होगा, लेकिन यह बहुत मजबूत नहीं है. सीजफायर की घोषणा के साथ ही ऐसी सूचना भी आई है कि कई देशों में मिसाइल अलर्ट पर हैं, यह स्थिति भी खतरनाक प्रतीत होती है.
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