अस्थिर विश्व को राह दिखा सकता है भारत

india : बढ़ती प्रतिस्पर्धा, बहुपक्षीय मानदंडों का क्षरण और नियम आधारित व्यवस्था का पतन वैश्विक अनिश्चितता को जन्म दे रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अब तक के लाभ खतरे में पड़ सकते हैं.

-जी एन बाजपेयी और प्रवीण तिवारी-

India : द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के लगभग 75 वर्षों की व्यापक वैश्विक शांति एक विकसित होती नियम आधारित व्यवस्था और मुक्त बाजार सिद्धांतों पर आधारित नवशास्त्रीय आर्थिक ढांचे से चिह्नित रही. मांग और आपूर्ति के परस्पर प्रभाव तथा संसाधनों के कुशल आवंटन ने इस व्यवस्था को मजबूती दी. इसके तहत जो द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था उभरी, उसमें संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसे वैश्विक संस्थानों ने, कुछ बड़े और ताकतवर देशों के प्रभाव में होने के बावजूद, विभिन्न देशों के बीच व्यापारिक और गैर-व्यापारिक विवादों को सुलझाने में बड़ी भूमिका निभायी.


वॉशिंगटन कंसेंसस और अर्थशास्त्री डेविड रिकार्डो के तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत से प्रभावित आर्थिक व्यवस्था ने पूंजी और वस्तुओं के मुक्त प्रवाह को बढ़ावा दिया. वॉशिंगटन कंसेंसस वे दस आर्थिक सिद्धांत और बाजार केंद्रित सुधार हैं, जिन्हें विकासशील देशों में व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाये रखने के लिए लागू किया गया. इनके जरिये उदारीकरण, निजीकरण और विनियंत्रण को बढ़ावा दिया गया. इनके जरिये दुनियाभर में पूंजी और वस्तुओं की निर्बाध आवाजाही शुरू हुई. इसका परिणाम अर्थशास्त्रियों द्वारा वर्णित ‘महान संतुलन काल’ के रूप में सामने आया, जो 1980 के दशक के मध्य से 2007 तक चला. इस दौरान महंगाई कम रही, आर्थिक वृद्धि स्थिर रही और आर्थिक अस्थिरता में भी कमी आयी.

अधिकांश देशों ने न केवल प्रगति की, बल्कि लाखों लोग गरीबी से बाहर भी आये. इस वैश्विक उदार आर्थिक व्यवस्था ने चीन जैसी नयी आर्थिक महाशक्तियों को उभरने का अवसर दिया. सोवियत संघ के विघटन के बाद एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय हुआ, जिसने एकतरफा नीतियों और वैश्विक संस्थानों की उपेक्षा को जन्म दिया. वैश्विक स्तर पर आय में वृद्धि के साथ-साथ अलबत्ता देशों के भीतर और देशों के बीच आर्थिक असमानता भी बढ़ी. इसने कई स्थानों पर दक्षिणपंथी राजनीति और आर्थिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया. साथ ही, एक नयी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का हिस्सा बनने की महत्वाकांक्षा भी बढ़ी. आज विश्व में वर्चस्व की दौड़ चल रही है, जिसने भू-राजनीतिक शांति को पीछे छोड़ दिया है.

बढ़ती प्रतिस्पर्धा, बहुपक्षीय मानदंडों का क्षरण और नियम आधारित व्यवस्था का पतन वैश्विक अनिश्चितता को जन्म दे रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अब तक के लाभ खतरे में पड़ सकते हैं. हाल की प्रभुत्ववादी गतिविधियां उस स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती हैं, जो आर्थिक विकास की नींव है. सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितताएं कम करने तथा अशांत विश्व से मानवता को बचाने के लिए एक स्थिरकारी शक्ति की जरूरत है. मध्यम शक्ति वाले देशों के पास अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन स्थापित करने का सुनहरा अवसर है, जो सहयोग, बहुपक्षवाद और नियम आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देकर अनिश्चितता को कम कर सकते हैं. भारत इस दिशा में लोकतांत्रिक ‘मध्यम शक्तियों’ के एक गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सक्षम है.


भारत की कई विशेषताएं हैं. एक तो यह कि भारत विश्व का सबसे बड़ा जीवंत लोकतंत्र और एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है. दूसरी, भारत ने हमेशा संप्रभुता के सम्मान, आक्रामकता से परहेज और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है. हाल की कुछ घटनाओं के बावजूद भारत ने कूटनीतिक संतुलन और व्यावहारिकता बनाये रखी है. कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने में भारत की भूमिका का समर्थन किया है. तीसरी, भारत की विश्वसनीयता मजबूत संस्थागत आधार पर टिकी है-जैसे कि एक बहुलतावादी राजनीतिक प्रणाली, जो शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन को सुनिश्चित करती है, एक संविधान जो कानून के शासन को बनाये रखता है, और प्रभावी प्रशासन. चौथी, दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और हिंद-प्रशांत के संगम पर स्थित भारत की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है. तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षमताओं के साथ भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, डिजिटल शासन और विकास सहयोग को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. मध्यम शक्ति का नेतृत्व सहयोग, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान पर आधारित होना चाहिए, न कि प्रभुत्व, दबाव और क्रूर आत्मस्वार्थ पर, जैसा कि हाल की घटनाओं में देखा गया.


भारत ने ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ कई द्विपक्षीय व्यापार समझौते किये हैं, जो सहयोग, समझदारी और आपसी सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित हैं. ये देश और संगठन बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान के पक्षधर हैं. एक महत्वपूर्ण मध्यम शक्ति के रूप में भारत विकसित और विकासशील देशों तथा वैश्विक उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु बन सकता है. नया गठबंधन संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे बहुपक्षीय संस्थानों को सुदृढ़ और अधिक न्यायसंगत बनाने पर ध्यान केंद्रित कर सकता है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार भारत की कूटनीतिक प्राथमिकता होनी चाहिए. साथ ही, भारत को जी-20, ब्रिक्स और क्वाड जैसे मंचों में अपनी भागीदारी बढ़ानी चाहिए. वर्तमान वैश्विक उथल-पुथल ने कई देशों को नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत पर जोर देने के लिए प्रेरित किया है.

भारत को ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, जापान, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, दक्षिण अफ्रीका और यूरोपीय संघ जैसे देशों के साथ जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा, साइबर शासन और आपूर्ति शृंखला जैसे मुद्दों पर सहयोग करना चाहिए. दुनिया जहां भारत को एक बड़े बाजार के रूप में देखती है, वहीं भारत को अंतरिक्ष, रक्षा, विमानन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और कुशल मानव संसाधन जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनकर वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. भारत को आर्थिक कूटनीति और विविधता, लोकतांत्रिक मजबूती तथा सभ्यतागत विरासत जैसी सांस्कृतिक शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए. हालांकि, मध्यम शक्तियों के नेतृत्व में कई चुनौतियां भी हैं, जैसे ढांचागत सुविधाओं की कमी, आर्थिक असमानता और प्रशासनिक जटिलताएं. इस संदर्भ में खासकर महाशक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाये रखना और संघर्ष की स्थितियों में विवेकपूर्ण कूटनीति अपनाना आवश्यक होगा. विखंडन, संकट और संघर्ष से भरा मौजूदा वैश्विक परिदृश्य भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है. भारत को अपनी क्षमताओं का उपयोग कर एक स्थिर, समावेशी और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए.
(ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं)

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