सहरसा: आज का युवा तकनीक के मामले में दुनिया भर से जितना जुड़ रहा है, भावनात्मक रूप से उतना ही अकेला होता जा रहा है. इसी बेहद संवेदनशील और समसामयिक मुद्दे को लेकर सहरसा के गायत्री शक्तिपीठ में एक विशेष 'व्यक्तित्व परिष्कार सत्र' का आयोजन किया गया. सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने बदलते सामाजिक परिवेश और 'जेनरेशन जी' (Gen Z) पर तकनीक व सोशल मीडिया के बढ़ते दुष्प्रभावों को बहुत ही बारीकी से सबके सामने रखा. डिजिटल खबर फॉर्मेट में आइए, इस सत्र की मुख्य और विचारणीय बातों को गहराई से समझते हैं.
'इमोशन' की जगह अब 'इमोजी' ने ली, वाई-फाई के दौर में दिल का कनेक्शन गायब
सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने कहा कि तकनीक ने हमारे जीवन को जितना आसान बनाया है, हमें उतना ही अकेला भी कर दिया है. आज का युवा वर्ग मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण अपना अधिकांश समय स्क्रीन के सामने बिता रहा है. उन्होंने पुराने दौर की याद दिलाते हुए कहा कि पहले बच्चे मैदानों में बाहर खेलते थे, लोगों से मिलते-जुलते थे, जिससे वे आपसी व्यवहार, दोस्ती, संघर्ष और सामाजिक रिश्तों का ककहरा सीखते थे. लेकिन आज के डिजिटल युग में इंसानी जज्बातों की जगह केवल मोबाइल के इमोजी ने ले ली है. ऑनलाइन दोस्ती, वर्चुअल क्लास, ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल मनोरंजन के चक्रव्यूह में फंसकर वास्तविक इंसानी संवाद लगातार कमजोर होता जा रहा है. उन्होंने युवाओं को सचेत करते हुए एक बेहद गहरी बात कही: "वाई-फाई से कनेक्ट होना आसान है, लेकिन दिल से कनेक्ट होना मुश्किल है."
सोशल मीडिया की दिखावटी दुनिया बन रही है डिप्रेशन और तनाव की वजह
डॉ. जायसवाल ने सोशल मीडिया पर दूसरों से अपनी तुलना करने की बीमारी को युवाओं की मानसिक परेशानी का सबसे बड़ा कारण बताया. उन्होंने कहा कि फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसी जगहों पर लोग रील और पोस्ट में अपनी जिंदगी के केवल सबसे खुशनुमा और चुनिंदा पल (बेहतर क्षण) ही दिखाते हैं. इसे देखकर आजकल के युवा भ्रमित हो जाते हैं और अपनी सामान्य जिंदगी को दूसरों से कमतर आंकने लगते हैं. इसी मानसिक द्वंद्व के कारण युवाओं में निराशा, तनाव, अकेलापन और मानसिक थकान तेजी से बढ़ रही है. इसके साथ ही करियर की अनिश्चितता, आर्थिक दबाव, टूटते रिश्तों की समस्या और भविष्य की चिंता भी युवाओं पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है.
मोबाइल बात सुन सकता है, समझ नहीं सकता; भारतीय संस्कारों की ओर लौटने की अपील
वक्ता ने स्पष्ट किया कि तकनीक अपने आप में कोई समस्या नहीं है, बल्कि इसका गलत और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल ही असली समस्या की जड़ है. उन्होंने एक सुंदर उदाहरण देते हुए कहा:
"मोबाइल व्यक्ति की बात सुन तो सकता है, लेकिन उसे कभी समझ नहीं सकता."
इस मानसिक संकट से उबरने के लिए उन्होंने परिवार और सच्चे दोस्तों से सीधे बातचीत करने, प्रकृति के करीब समय बिताने, नियमित रूप से टहलने, योग-प्राणायाम करने और एक अनुशासित व संतुलित दिनचर्या अपनाने की सलाह दी. उन्होंने हमारी पारंपरिक भारतीय जीवन मूल्यों, रामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता और नैतिक संस्कारों को ही सुखी जीवन, सुदृढ़ परिवार और एक स्वस्थ समाज के निर्माण की असली आधारशिला बताया.
सऊदी अरब, ओमान और पटना से पहुंचे प्रबुद्ध लोगों ने भी जगाई अलख
इस विशेष सत्र में केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर काम कर रहे प्रबुद्ध लोग भी शामिल हुए:
सऊदी अरब से आए सुमित मुग्दल ने समाज और देश की नई पीढ़ी के सर्वांगीण विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की.
ओमान से आए वनाची श्रेयर ने सकारात्मक सोच को ही जीवन में सच्ची सफलता का मुख्य आधार बताया.
पटना से आए इंजीनियर अरविंद कुमार ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि वे यहाँ से जीवन जीने का एक अद्भुत और सच्चा मूल मंत्र लेकर अपने घर वापस जा रहे हैं.इस गरिमामयी कार्यक्रम में शक्तिपीठ परिवार के सभी सदस्य, स्थानीय परिजन और युवा बड़ी संख्या में उपस्थित रहे.
