निश्चय यात्रा. 500 से अधिक है मोरों की संख्या, सामान्य पंछियों की तरह रहते हैं गांव में
निश्चय यात्रा के क्रम में 17 दिसंबर को मुख्यमंत्री जिले में आने के साथ पहले सत्तरकटैया प्रखंड के आरण गांव जायेंगे. जहां वे राष्ट्रीय पक्षी मोरों के इस गांव को मयूर अभयारण्य बनाने की घोषणा करेंगे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आरण प्रभात खबर ले जा रहा है.
सहरसा : चार सितंबर को पहली बार प्रभात खबर के अंक में ‘जंगल में नहीं, गांव में नाचते हैं मोर’ शीर्षक से खबर प्रकाशित हुई थी. उस खबर को गंभीरता से लेते सीएम ने जिले के डीएम से जांच करायी और पुष्टि होने के बाद 17 को खुद वहां जा रहे हैं.
डॉक्यूमंटरी फिल्म भी बनी: वन विभाग के अधिकारियों की जांच के बाद डीएम बिनोद सिंह गुंजियाल ने खुद दो बार आरण गांव जाकर वस्तुस्थिति का जायजा लिया. जंगल-जंगल घूम मोरों को सामान्य पंछियों की तरह विचरते देखा. वहां ग्रामीणों से इस संबंध में पूरी जानकारी ली. उसके बाद वन विभाग इस गांव पर अधिक मेहरबान होता नजर आया. सड़कों के किनारे मोरों के पसंद के पेड़ लगाये जाने लगे.
नवंबर महीने में बिहार सरकार के निर्देश पर डॉक्यूमेंटरी फिल्म का निर्माण भी शुरू हुआ. पटना के साक्षी कम्युनिकेशन की टीम ने लगभग एक सप्ताह तक गांव में रह कर आरबी सिंह के निर्देशन में आरण गांव के साथ मोरों के संबंध पर फिल्म बनायी. लोगों के घर-आंगन में बेरोकटोक आते-जाते, एक डाल से दूसरे पर उड़ते, घरों के छत पर सड़कों पर चलते मोर का फुटेज शूट किया.
एंकर रुचि ने भी अपनी आकर्षक शैली में आरण गांव में मोर के
इतिहास व वर्तमान परिवेशों का बखूबी वर्णन किया.
प्रभात खबर में खबर छपने के बाद सीएम ने लिया था संज्ञान
प्रभात खबर में प्रमुखता से प्रकाशित की गयी थी खबर.
कांव-कांव से अधिक पिहू-पिहू
कहते हैं इस आरण गांव में कौवों की भी उतनी संख्या नहीं है, जितनी मोरों की. लिहाजा गांव में कांव-कांव की आवाज नहीं के बराबर सुनायी देती है. जबकि मोर के पिहू-पिहू की आवाज से गांव की हर बस्ती गूंजती रहती है. मोर के साथ गांव के लोगों की इतनी घनिष्टता हो गयी है कि उन्हें कुछ भी अजूबा नहीं लगता. लोगों के घर-दरवाजे पर, खेत-खलिहान में, घरों के छत पर या फिर बीच सड़क पर ये सामान्य पंछियों की तरह विचरते हैं, उड़ते रहते हैं. ये गांव में रहने वाले अन्य मवेशियों के साथ सामान्य रूप से रहते हैं. साथ-साथ दाना चुगते हैं. बेखौफ और बेरोकटोक किसी के भी घर में उनका आना-जाना लगा रहता है.
हां, घर में रखे अनाज या खेतों में बोयी फसल के बीज को नुकसान करने पर वे आवाज लगाकर उसे भगा जरूर देते हैं. लेकिन मोर कभी गांव की चौहद्दी से बाहर नहीं जाते. वे घुम-फिर कर वापस लोगों की बस्ती के बीच ही आ जाते हैं. ग्रामीण बताते हैं कि जेठ-वैशाख के महीने में गांव की सड़कों पर मोर का झुंड सड़कों पर घुमता रहता है. उस समय एक साथ सैकड़ों मोर के सड़क पर आ जाने से अक्सर जाम की भी स्थिति बन जाती है. हालांकि यहां जाम में फंसना लोगों को अच्छा लगता है. वे वहां रूक कर मोर को काफी करीब से देखने लग जाते हैं.
एक जोड़ी से संख्या हुई 500
25 साल पूर्व साल 1991 में एक प्रवासी मजदूर ने पंजाब से नर व मादा मोर के बच्चे की एक जोड़ी लाकर गांव के अभिनंदन यादव उर्फ कारी झा को दिया था. कारी झा ने उसे बड़े जतन से पाला. बिलाड़-कुत्ते और दूसरे घातक जानवरों से उसकी रक्षा की. कुछ वर्षों के बाद बड़े होने पर मोरनी ने एक साथ छह अंडे दिये. जिससे मोर के छह बच्चे हुए. धीरे-धीरे कारी झा का घर मोरों से भर गया. परेशान होकर इन्होंने सभी मोरों को ले जाकर गांव के जंगल में छोड़ दिया. लेकिन मोर गांव छोड़कर कहीं नहीं गये. पर्यावरण अनुकूल होने के कारण उनकी संख्या में लगातार वृद्धि होती होती गयी और आज तकरीबन पांच सौ की संख्या तक पहुंच चुकी है.
गांव में मोर का बसना ग्रामीणों को सुखद लगने लगा. वे गौरवान्वित होने लगे. लेकिन वे राष्ट्रीय पक्षी के संरक्षण के प्रति चिंतित भी होने लगे. गांव के लोग कहते हैं कि सरकार यदि इसे मयूर अभ्यारण्य बना कर पर्यटन क्षेत्र घोषित कर दे तो इसका संरक्षण भी होता रहेगा और गांव सहित सरकार को आमदनी भी होती रहेगी.
