सुविधा. आदिमयुग के अंत होने की दिखने लगी है संभावनाएं, बनने लगा है घर-घर शौचालय
कल तक यहां के महिला-पुरुष व बच्चे सुबह होते ही शौच के लिए लोटा ले सुनसान स्थान की तलाश में निकल पड़ते थे. शाम होते ही महिलाएं अंधेरे व कोने की खोज में निकल पड़ती थी. लेकिन आज यहां घर-घर शौचालय का निर्माण कराया जा रहा है.
कहरा (सहरसा) : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आगमन के बहाने ही सही, उनके सात निश्चयों के कारण ही सही. प्रखंड के सिरादेयपट्टी पंचायत की तकदीर व तसवीर दोनों बदलती दिखाई देने लगी है. कल तक यहां के महिला-पुरुष व बच्चे सुबह होते ही शौच के लिए लोटा ले सुनसान स्थान की तलाश में निकल पड़ते थे. शाम होते ही महिलाएं अंधेरे व कोने की खोज में निकल पड़ती थी. लेकिन आज यहां घर-घर शौचालय का निर्माण कराया जा रहा है. सात निश्चय के तहत हर घर नल-जल, बिजली व अन्य अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध करायी जा रही है. प्रशासन के अधिकारी योजना पूर्ण कराने में परेशान हैं तो गांव वाले भी उन्हें बढ़-चढ़ कर सहयोग कर रहे हैं.
ग्रामीणों के उत्साह को देखकर लगता है कि अब उन्हें खेतों की ओर नहीं जाना होगा. महिलाओं को अंधेरे का इंतजार नहीं करना होगा. मुख्यमंत्री के आगमन की तैयारी में पूरा प्रशासनिक अमला बीते 15 दिनों से सिरादेयपट्टी पंचायत का दौरा कर रहा है. अधिकारी लोगों से मिल घर में शौचालय बनाने को प्रोत्साहित कर रहे हैं. जनप्रतिनिधियों के साथ बैठक कर संपूर्ण पंचायत को खुले में शौचमुक्त बनाने की योजना तैयार कर रहे हैं. लोगों को शौचालय निर्माण के लिए प्रोत्साहन राशि दिए जाने की बात कही जा रही है
. इसके प्रत्यक्ष व परोक्ष फायदे गिनाये जा रहे हैं. कह रहे हैं कि घर की इज्जत घर में रहे, यही अच्छा है. दूसरों के खेतों में जाने पर होने वाले अनावश्यक विवाद से बचना ही ठीक है. इसीलिए घर के किसी कोने में वे शौचालय का निर्माण करा उसका उपयोग करें. इससे प्रतिष्ठा तो बचेगी ही. समाज में सम्मान मिलेगा. अनावश्यक विवाद से मुक्ति मिलेगी और बेवजह बीमारियों को आमंत्रण नहीं मिलेगा.
लोगों को अब चूल्हा तोड़ने तक से नहीं है गुरेज
प्रशासन के अधिकारी व अपने बीच के उनके जनप्रतिनिधि के समझाने पर पंचायत के लगभग सभी लोगों ने गांव को शौचमुक्त बनाने का प्रण लिया है व युद्ध स्तर पर घर-घर इसका निर्माण कराया जा रहा है. वे अपनी जमीन का एक छोटा सा हिस्सा शौचालय निर्माण के नाम कर रहे हैं. जागरूकता अभियान का असर यह हुआ है कि जगह कम होने की स्थिति में लोग रसोई के अलावे आंगन में बने चुल्हे तक को तोड़ने से परहेज नहीं कर रहे हैं.
कहते हैं कि इनसान का स्वभाव रहा है कि भले ही वह एक शाम भूखा रह जाये, लेकिन उसकी इज्जत बची रहनी चाहिए. आज तक उनका यह स्वभाव कुंठित था. लेकिन उनकी भावना जग चुकी है. वे न तो खुले में शौच करेंगे न ही परिवार के किसी सदस्य को जाने देंगे. हम भी शहरियों की तरह आदिमयुग से आधुनिक युग में जायेंगे.
