हो जायें सचेत, हर साफ दिखने वाला पानी पीने योग्य नहीं होता

बरसात के दिनों में जल जनित रोगों की संख्या बढ़ जाती है. जिले में पानी की शुद्धता जांचने के लिए जल जांच केंद्र बना हुआ है, लेकिन इसकी रिपोर्ट पर कोई सुधारात्मक कार्रवाई नहीं होती. प्रत्येक माह रूटीन के अनुसार विभिन्न स्थानों से पानी का सैंपल लेकर उसकी जांच की खानापूर्ति पूरी की जाती है. […]

बरसात के दिनों में जल जनित रोगों की संख्या बढ़ जाती है. जिले में पानी की शुद्धता जांचने के लिए जल जांच केंद्र बना हुआ है, लेकिन इसकी रिपोर्ट पर कोई सुधारात्मक कार्रवाई नहीं होती. प्रत्येक माह रूटीन के अनुसार विभिन्न स्थानों से पानी का सैंपल लेकर उसकी जांच की खानापूर्ति पूरी की जाती है.
नवादा (नगर) : पीने का पानी साफ व शुद्ध हो इसके लिए लोग महंगे उपकरण लगाकर अपनी सुरक्षा के लिए प्रयास करते दिखते हैं. लेकिन यह उपाय सभी लोगों के लिए संभव नहीं है. आम लोगों के लिए सरकारी चापाकल या वाटर सप्लाइ के अलावे स्थानीय स्तर पर हुई व्यवस्था ही पेयजल का साधन बनता है. ऐसे में सामान्य लोगों को सरकारी या निजी स्तर पर उपलब्ध पेयजल के स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है. इन पेयजल के स्रोतों के जांच की कोई सुविधा नहीं है. जिले में फ्लोराइड से प्रभावित कई क्षेत्र हैं, जहां लोगों को सही गलत पानी के श्रोत की जानकारी होना जरूरी है. बावजूद इसको लेकर सही तैयारी नहीं दिख रही है.
पिछले कुछ वर्षों से जिला जल जांच केंद्र द्वारा दिये गये रिपोर्ट के बावजूद एक भी प्रदूषित चापाकल या अन्य पेयजल स्रोतों को बंद नहीं किया गया. ऐसे में लोगों को खुद सचेत होने की जरूरत है. साफ दिखने वाला पानी पीने योग्य है या नहीं इसकी जांच जरूर कराना चाहिए. जुलाई में जिला जांच केंद्र द्वारा कौआकोल के सेखोदेवरा के चापाकल, सदर प्रखंड के पौरा गांव में नदी किनारे का पानी व सिरदला के गांव में फ्लोराइड व बैक्टेरिया की अधिक मात्रा की रिपोर्ट भेजी गयी थी, लेकिन कार्रवाई के लिए कोई आदेश नहीं आये. इसके कारण आज भी इन स्थानों के लोग उक्त जल स्रोतों से ही पानी पी रहे हैं, जो जिम्मेवारी हैं उन्हें लोगों की चिंता ही नहीं है. इसी प्रकार जून में 278 सैंपल की जांच में से चार में बैक्टेरिया व 11 में फ्लोराइड की मात्रा अधिक मिली थी. केंद्र के कर्मचारियों के अनुसार, पानी में एक साथ बैक्टेरिया, फलोराइड, नाइट्रेट, आयरन आदि की मात्रा अनुपात से काफी अधिक होती है, तब चापाकल बंद करने का संदेश दिया जाता है. ऐसी स्थिति माह में एक या दो हो जाता है.
पानी के तय मानकों की होती है जांच : जिला जल जांच केंद्र द्वारा प्रत्येक माह में तीन सौ विभिन्न जल स्रोतों के सैंपल के जांच की बात कही जा रही है. यहां पानी में व्याप्त पीएच मान, चालकता, हाइनेश, अल्कनीटी, टीडीएस, फ्लोराइड, कैल्सियम, मैग्नेशियम, नाइट्रेट, आयरन, बैक्ट्रिया, सल्फेट आदि की जांच की जाती है. विभाग की जानकारी के अनुसार, इसमें स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र के चापाकलों के जल को प्राथमिकता के आधार पर जांच की जाती है, इसकी रिपोर्ट भारत सरकार व बिहार सरकार के अलावे विभागीय अधिकारियों को दी जाती है, लेकिन इस रिपोर्ट में पानी के तत्व में होने वाली खराबी के जानकारी मिलने के बाद भी उस चापाकल या अन्य जल श्रोतों को नष्ट किये जाने या उपयोग बंद करने की कार्रवाई नहीं की जा रही है.
आरओ मिनिरल वाटर की जांच भी जरूरी : जिले में धड़ल्ले से दर्जनों नामों से आरओ मिनिरल वाटर की पैकिंग कर सप्लाइ की जा रही है. इसके पानी में शुद्धता है या नहीं इसकी जांच के लिए भी कड़े प्रावधान हैं, लेकिन जिले में एक भी मिनिरल वाटर विक्रेता जिला जल जांच केंद्र से अपने पानी की जांच नहीं करवाते हैं. विभागीय जानकारी के अनुसार, प्रत्येक तीन माह पर क्लारिनेशन व वर्ष मे एक बार केमिकली जांच रिपोर्ट लेना जरूरी है, लेकिन इसकी गुणवत्ता की जांच यहां नहीं हो रही है. इसलिए आरओ वाटर के नाम पर मिलने वाला पानी भी शुद्ध है या नहीं, इसमे संशय बरकरार है. जबकि विभाग इस मनमानी पर कार्रवाई भी नहीं कर पा रही है.
घरों में पानी का ट्रीटमेंट जरूरी
घरों में लगे चापाकल या पानी टंकी की सफाई व वाटर ट्रीटमेंट जरूरी है. घरों में लोगों को साफ पानी मिले इसके लिए प्रत्येक तीन माह पर पानी का क्लोरीनेशन किया जाना जरूरी है.
एक हजार लीटर पानी टंकी के क्लोरीनेशन के लिए वाटर टैंक में 50 ग्राम तक ब्लीचिंग पाउडर को पानी मे घोल कर टंकी में डाल कर 12 घंटे तक के लिए छोड़ दें, इसके बाद टंकी को पूरी तरह से पानी भर कर खाली करने के बाद इसका इस्तेमाल करें. इसी प्रकार चापाकल में 30 से 50 ग्राम तक ब्लीचिंग पाउडर का घोल डाल कर 12 घंटों तक इस्तेमाल नहीं करें, इसके बाद पांच-छह बाल्टी बहाने के बाद पानी का उपयोग करें, इससे होने वाली वैक्टिरिया जनित रोगों से पानी को दूषित होने से बचाया जा सकता है. इकोली, सालमोलेना जैसे हानिकारक वैक्टिरिया इस प्रक्रिया के कारण प्रभावी नहीं हो पाते हैं.
बरसात में पानी दूषित होने का खतरा अधिक
बरसात के दिनों में बारिश के कारण सतह पर की गंदगी पानी के मिल कर पेयजल के श्रोतों के निकट पहुंच जाता है. चापाकल या मोटर के बोरिंग के पास से होते हुए यह सीधे रिसाव करके जल के मुख्य संचय स्थल तक पहुंच जाता है. इससे पानी सबसे अधिक प्रदूषित होती है. जबकि पानी में एक्टिव होने वाले विषाणु तापमान के बढ़ने के बाद 37 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक तापमान होने पर होता है.

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