नवादा मंडल कारा: 22 जुलाई को हुई कैदी की मौत मामले में कक्षपाल निलंबित, जांच में जुटी पुलिस

नवादा मंडल कारा में पिछले सात सालों में 10 बंदियों की मौत ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं. बीमारी और अन्य चिकित्सीय कारणों को मौत की वजह बताया जा रहा है, लेकिन व्यवस्था पर गंभीर चिंता जताई जा रही है.

Nawada News : नवादा मंडल कारा में दिसंबर 2019 से जुलाई 2026 तक नवादा मंडल कारा में 10 बंदियों की मौत ने जेल की स्वास्थ्य व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र और निगरानी प्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. अधिकांश मामलों में कारा प्रशासन ने बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कोरोना संक्रमण अथवा अन्य चिकित्सकीय कारणों को मौत की वजह बताया. कई मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी इन कारणों की पुष्टि की.

22 जुलाई को घनश्याम की मौत के बाद कक्षपाल निलंबित

सबसे ताजा मामला 22 जुलाई 2026 का है. मेसकौर थाना क्षेत्र के महाराजवन निवासी 19 वर्षीय विचाराधीन बंदी घनश्याम कुमार उर्फ दुलारचंद की जेल परिसर में फंदे से लटकने के बाद मौत हो गई. इलाज के लिए सदर अस्पताल लाए जाने पर चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया. घटना के बाद ड्यूटी पर तैनात कक्षपाल नीतीश कुमार को प्रथम दृष्टया लापरवाही के आरोप में निलंबित कर दिया गया और मामले की जांच जारी है.

जानिए... सात वर्षों में कब-कब हुई बंदियों की मौत

6 जनवरी 2026 को हिसुआ निवासी मनोज साव उर्फ टुनटुन साव की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई, जबकि 19 जून 2025 को वारिसलीगंज निवासी दिनेश राम और 30 मई 2024 को रजौली की धनमा देवी की जेल में मौत हुई. वर्ष 2022 में विजय मांझी की मौत के बाद ग्रामीणों ने पुलिस पर पथराव किया था. वर्ष 2021 में चार बंदियों की अलग-अलग समय पर मौत हुई, जबकि गुड्डू कुमार की संदिग्ध मौत के मामले ने पूरे बिहार का ध्यान नवादा मंडल कारा की ओर खींचा. इस सिलसिले की शुरुआत 5 दिसंबर 2019 को कपिल राजवंशी की संदिग्ध मौत से हुई थी.

बार-बार हुई विभागीय कार्रवाई भी सवालों के घेरे में

गुड्डू कुमार मौत मामले में तत्कालीन काराधीक्षक अभिषेक कुमार पांडेय सहित कई जेल कर्मियों पर विभागीय कार्रवाई और निलंबन हुआ था. ताजा मामले में कक्षपाल नीतीश कुमार निलंबित किए गए हैं. इससे पहले भी जेल प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों और कर्मियों पर कार्रवाई हो चुकी है.

स्वास्थ्य, सुरक्षा और निगरानी पर उठ रहे सवाल

लगातार हो रही मौतों ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं. क्या गंभीर बीमार बंदियों की नियमित चिकित्सकीय निगरानी पर्याप्त है? क्या मानसिक तनाव से जूझ रहे विचाराधीन बंदियों की पहचान और काउंसिलिंग की समुचित व्यवस्था है? क्या हाई-रिस्क बंदियों पर विशेष निगरानी रखी जाती है?




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By Ashutosh kumar

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