बिहारशरीफ़ : हज यात्रियों का पहला जत्था बिहारशरीफ अपने घर पहुंच गया है. शहर के छज्जु मोहल्ले से हज पर गये दो यात्री वापस लौट आये हैं. इनके आगमन लोगों में काफी उल्लास है.
घर पहुंचने पर फूल माला पहनाकर लोगों ने स्वागत कर स्वाव हासिल की. शहर के छज्जु मोहल्ला निवासी मो. अफलाव आलम व उनकी मां मुस्तरी खातून 18 अगस्त को यहां से हज के लिए रवाना हुए थे. 42 दिनों की यात्रा वृतांत के बारे में वे बताते है कि वैसे मुसलिम भाई जो सामर्थ्य है उन्हे एक बार हज करना फर्ज है.
वे बताते है कि जव यहां रवाना हो रहे थे परिवार से दूर होने का गम सता रहा था. जब साउदी अरब स्थित मक्का पहंुचे तो 42 दिन अल्लाह के इबादत में कैसे कट गया एहसास ही नहीं हुआ. जैसे ही वापसी के दिन आये तो मन बेचैनी होनी लगी वहां से आने का दिल ही कर रहा था.
मदीना सचमुच अल्लाह का घर है. वे बताते है कि यात्रा के पहले नौ दिन मदीना में रहकर 40 वक्त का नवाज अदा करना पड़ता है. मदीना के मस्जिदे हरम में हर रोज नवाज पढ़ा जाता है. उसके बाद वहां से बस द्वारा लोगों को मक्का ले जाया जाता है. वहां 35 दिनों तक रहना पड़ता है. इस दौरान हर दिन वहां भी हर दिन पांच वक्त का नवाज पढ़ना फर्ज है. आखिरी पांच दिन अरफात, मीना व मुल्दलफा में इबादत करना पड़ता है.
इस दौरान मीना के कैप में रहना पड़ता है. यात्रा करने वाले लोगों को मीना में सात कंकड़ मारना पड़ता है. अंतिम यात्रा में अल्लाह के घर यानि खाने कावा का चार चक्कर लगाना पड़ता है. वे अफताव बताते है कि वहां का सबसे प्रसिद्ध चीज आवे जमजम है. आवे जमजम वहां के जमीन से निकला हुआ पानी है जिसे पीने से कुछ देर के लिए भूख प्यास मिट जाता है. साथ ही कई बीमारी में भी फायदा करता है.
