चार साल से धूल फांक रहा छह अत्याधुनिक वेंटिलेटर

चार साल से धूल फांक रहा छह अत्याधुनिक वेंटिलेटर

सदर अस्पताल में क्लिनिकल स्टेबलिसमेंट एक्ट की धज्जियां व वेंटिलेटर की अनदेखी सदर अस्पताल को मई 2021 में कोरोना काल के दौरान मिले थे छह आधुनिक वेंटिलेटर उपलब्ध संसाधनों के बावजूद रेफर हो रहे गंभीर मरीज मुंगेर. स्वास्थ्य विभाग भले ही निजी स्वास्थ्य केंद्रों को क्लिनिकल स्टेबलिसमेंट एक्ट के तहत संचालन करने का निर्देश दे, लेकिन सदर अस्पताल खुद वर्षों से इस एक्ट की अवहेलना कर रहा है. खास बात यह है कि इस अस्पताल का आईसीयू (इंटेंसिव केयर यूनिट) वार्ड बिना वेंटिलेटर के ही चल रहा है. जबकि सदर अस्पताल को कोरोना महामारी के दौरान अत्याधुनिक छह वेंटिलेटर मिले थे, वे अब पीकू वार्ड में धूल फांक रहे हैं. इस स्थिति का मुख्य कारण अस्पताल में एनेस्थेटिक (मूर्छक विशेषज्ञ) की कमी है, जिसकी वजह से वेंटिलेटर का संचालन नहीं हो पा रहा है. कोरोना काल में मिले थे छह वेंटिलेटर कोरोना महामारी के दौरान पूरे देश में स्वास्थ्य संस्थाओं में आपातकालीन स्थिति उत्पन्न हो गई थी. मरीजों की जान बचाने के लिए केंद्र सरकार ने पीएम केयर फंड से वेंटिलेटर की आपूर्ति की थी. मई 2021 में मुंगेर सदर अस्पताल को भी छह अत्याधुनिक वेंटिलेटर मिले थे. शुरुआत में इन्हें कोविड केयर यूनिट में लगाया गया था, लेकिन 2023 में 32 बेड का पीकू वार्ड बनने के बाद इन वेंटिलेटरों को वहां शिफ्ट कर दिया गया. लेकिन आज चार साल बाद भी ये वेंटिलेटर आईसीयू में स्थापित नहीं हो पाए हैं और ना ही किसी मरीज की जान बचाने में काम आए हैं. बिना वेंटिलेटर वाले आईसीयू में मरीजों की हालत गंभीर सदर अस्पताल का आईसीयू वार्ड आज भी बिना वेंटिलेटर के चल रहा है. इसका नतीजा यह है कि गंभीर बीमारियों और सड़क दुर्घटनाओं के शिकार मरीजों को या तो अन्य जिलों के अस्पतालों या फिर निजी नर्सिंग होम का सहारा लेना पड़ता है. यहां इलाज के लिए उन्हें बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है. यही नहीं, अस्पताल में सिर्फ कॉर्डियेक मॉनिटर लगे हुए हैं, जो केवल मरीजों के वाइटल साइन (हृदय गति, रक्तचाप, आदि) को ट्रैक कर सकते हैं, लेकिन वेंटिलेटर के बिना, गंभीर मरीजों का इलाज प्रभावी रूप से नहीं किया जा सकता. सदर अस्पताल में एनेस्थेटिक की गंभीर कमी सदर अस्पताल के आईसीयू में 8 बेड हैं, जिनमें से छह बेड पर कॉर्डियेक मॉनिटर लगाए गए हैं. लेकिन यहां की सबसे बड़ी समस्या एनेस्थेटिक (मूर्छक विशेषज्ञ चिकित्सक) की कमी है. अस्पताल में पिछले कई सालों से एनेस्थेटिक की नियुक्ति नहीं की गई है. जो एनेस्थेटिक अस्पताल में ऑपरेशन करने के लिए काम करते हैं, वे छह महीने के प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सक हैं, जो नियमानुसार वेंटिलेटर का संचालन नहीं कर सकते. इस वजह से अस्पताल में आए वेंटिलेटर, जो मरीजों की जान बचा सकते थे, धूल फांक रहे हैं. अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि इन वेंटिलेटरों को चलाने के लिए योग्य एनेस्थेटिक की आवश्यकता है, और इस कमी के कारण ये वेंटिलेटर अब तक उपयोग में नहीं आ सके हैं. सिविल सर्जन का बयान इस मुद्दे पर सिविल सर्जन डॉ रामप्रवेश ने बताया कि वेंटिलेटर का संचालन केवल एनेस्थेटिक चिकित्सक कर सकते हैं. उन्होंने कहा, कोरोना काल में कुछ कर्मियों को वेंटिलेटर चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी, लेकिन अब तक आधे सेवानिवृत्त हो चुके हैं. कई अन्य का स्थानांतरण हो चुका है. इस कारण अस्पताल में वेंटिलेटर का इस्तेमाल नहीं हो पाया है. इस स्थिति के बारे में विभाग को अवगत कराया गया है. दिखावे के लिए लगाया गया एक वेंटिलेटर सदर अस्पताल की स्थिति और भी विकट हो जाती है, जब पता चलता है कि बड़े नेताओं व अधिकारियों के दौरे के दौरान एक वेंटिलेटर को आईसीयू वार्ड में दिखावे के लिए लगाया गया था. अगस्त 2023 में विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जैसे बड़े नेताओं ने मुंगेर का दौरा किया था. इस दौरान स्वास्थ्य विभाग ने आईसीयू में एक बेड पर वेंटिलेटर लगाकर दिखाया, ताकि यह प्रतीत हो कि अस्पताल में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं. हालांकि, अब तक इस वेंटिलेटर का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ है, और यह सिर्फ एक कोने में रखा हुआ है, बिना किसी मरीज के इलाज के.

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Author: RANA GAURI SHAN

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