96 पंचायतों में 523 कूड़ा वाहन खराब, 10 हजार में कैसे पटरी पर लौटेगी सफाई व्यवस्था

सफाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले 523 कूड़ा वाहन (रिक्शा-ठेला) खराब पड़े थे. इनकी मरम्मत के लिए जिला प्रशासन ने प्रति पंचायत मात्र 10 हजार रुपये की राशि आवंटित की, लेकिन इतनी कम राशि में सैकड़ों वाहनों को दुरुस्त करना मुश्किल साबित हो रहा है.

– डेडलाइन खत्म, फिर भी 45 रिक्शा-ठेला अब तक बंद; ग्रामीण स्वच्छता अभियान की रफ्तार पर उठे सवाल

मुंगेर

ग्रामीण क्षेत्रों में लोहिया स्वच्छता अभियान और स्वच्छ भारत मिशन को गति देने के सरकारी दावे जमीन पर कमजोर पड़ते दिख रहे हैं. जिले की 96 पंचायतों में सफाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले 523 कूड़ा वाहन (रिक्शा-ठेला) खराब पड़े थे. इनकी मरम्मत के लिए जिला प्रशासन ने प्रति पंचायत मात्र 10 हजार रुपये की राशि आवंटित की, लेकिन इतनी कम राशि में सैकड़ों वाहनों को दुरुस्त करना मुश्किल साबित हो रहा है.

डेट लाइन खत्म, 45 पैडल रिक्शा व ठेला पड़ा है खराब

मिली जानकारी के अनुसार उपविकास आयुक्त की ओर से सभी प्रखंड विकास पदाधिकारियों को 15 जून तक खराब पड़े कूड़ा वाहनों की मरम्मत सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था. उद्देश्य यह था कि हर वार्ड में स्वच्छता कर्मी नियमित रूप से घर-घर जाकर सूखा और गीला कचरा एकत्र करें तथा पंचायतों में बने वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट (डब्ल्यूपीयू) तक पहुंचाएं. हालांकि तय समय सीमा समाप्त होने के बावजूद अब तक सिर्फ 478 कूड़ा वाहनों की ही मरम्मत हो सकी है, जबकि 45 वाहन अब भी खराब हालत में पड़े हैं. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि आखिर प्रति पंचायत केवल 10 हजार रुपये में इतने बड़े स्तर पर मरम्मत कार्य कैसे संभव हो सकता है. मिली जानकारी के अनुसार एक-एक पंचायत में 10-10, 15-15 पैडल रिक्शा व ठेला है. जिसकी मरम्मती 10 हजार में होना संभव नहीं है. जैसे-तैसे मरम्मती करवा कर उसे चालू तो करवा दिया गया है, लेकिन वह फिर एक से दो महीने में दम तोड़ देंगी. हालांकि प्रशासनिक स्तर पर यह सख्त निर्देश दिया गया कि जिन पंचायतों में ई-रिक्शा की खरीद इसके लिए हुई, उसकी मरम्मती इस मद से नहीं होगी. जिसके कारण ई-रिक्शा की जहां खरीद हुई, वह अब कबाड़ हो चुका है.

पंचायतों में कूड़ा उठाव का हाल बेहाल

बताया जाता है कि जिले के कुल 76 पंचायतों में सफाई व्यवस्था संभालने के लिए 1286 स्वच्छता कर्मी डोर-टू-डोर कचरा उठाव में लगे हैं. वहीं पंचायतों में बने वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट में प्रतिनियुक्त कर्मी सूखा और गीला कचरा अलग करने का काम करते हैं. कुल 1388 स्वच्छता कर्मी और 96 सुपरवाइजर ग्रामीण इलाकों में सफाई व्यवस्था संभाल रहे हैं. प्रशासन का दावा है कि स्वच्छता मिशन की निगरानी के लिए ‘स्वच्छता मित्र ऐप’ के जरिए प्रतिदिन मुख्यालय स्तर से मॉनिटरिंग का दावा भी किया जाता है. लेकिन हकीकत कुछ और ही बया कर रही है. सदर प्रखंड के मिर्जापुर बरदह, मय, कटरिया पंचायत के ग्रामीणों का कहना है कि सफाई व्यवस्था की सफलता के लिए सिर्फ निर्देश जारी करना काफी नहीं है, बल्कि पर्याप्त संसाधन और बजट भी जरूरी है. सफाई में लगे कर्मी को कई-कई माह मानदेय नहीं मिलता. जिसके कारण वह वार्ड में कूड़ा लेने ही नहीं आता है.

कहते हैं डीडीसी

उपविकास आयुक्त अजीत कुमार सिंह ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए सभी पंचायतों को राशि उपलब्ध करा दी गई है. 478 कूड़ा वाहनों की मरम्मत हो चुकी है तथा शेष वाहनों को भी जल्द दुरुस्त कराया जा रहा है. जरूरत पड़ने पर यूजर चार्ज की राशि से भी मरम्मत कराने का निर्देश दिया गया है.

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