Quit India Movement: अगस्त क्रांति का वो दौर, जब मोतिहारी में छात्रों-किसानों ने अंग्रेजों के खिलाफ संभाल ली थी कमान

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान चंपारण, खासकर मोतिहारी, अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनआक्रोश का एक प्रमुख केंद्र बना. स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद छात्रों और किसानों ने मिलकर आंदोलन को नई दिशा दी.

Motihari History: भारत छोड़ो आंदोलन यानी अगस्त क्रांति के इतिहास में चंपारण का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है. वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के 'करो या मरो' के आह्वान के बाद नौ अगस्त को चंपारण में जनआक्रोश का ऐसा सैलाब उमड़ा कि अंग्रेजी शासन की नींव हिल गई. मोतिहारी इस आंदोलन के प्रमुख केंद्रों में शामिल रहा, जहां स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आम जनता, छात्रों और किसानों ने आंदोलन की कमान संभाल ली.

9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार हुए बड़े नेता

सांकेतिक तस्वीर

9 अगस्त 1942 को ब्रिटिश सरकार ने 'ऑपरेशन जीरो आवर' के तहत देश के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था. चंपारण में भी स्थानीय नेतृत्व की धरपकड़ की गई. लेकिन नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन कमजोर होने के बजाय और तेज हो गया. आम लोगों और युवाओं ने स्वयं आंदोलन को आगे बढ़ाया.

मोतिहारी में छात्रों और किसानों ने संभाली कमान

मोतिहारी में हजारों छात्रों और किसानों के सड़कों पर उतरने की बात सामने आती है. आंदोलनकारियों ने कचहरी, डाकघर और रेलवे स्टेशनों को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया. इससे ब्रिटिश प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया.

रेल पटरी उखाड़कर संचार व्यवस्था की ध्वस्त

ब्रिटिश फौज की आवाजाही रोकने के लिए क्रांतिकारियों ने मोतिहारी और आसपास के क्षेत्रों में रणनीतिक कार्रवाई की. मोतिहारी-सुगौली रेल मार्ग की पटरियां उखाड़े जाने की घटनाएं सामने आईं. संचार व्यवस्था को बाधित करने के लिए टेलीफोन और टेलीग्राम के खंभे तथा तार भी काटे गए.

इसका असर यह हुआ कि जिला मुख्यालय का पटना और मुजफ्फरपुर स्थित सैन्य मुख्यालयों से संपर्क बाधित हो गया. कई दिनों तक ब्रिटिश प्रशासन को संचार और प्रशासनिक नियंत्रण में मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

कचहरी पर फहराया गया तिरंगा

अगस्त क्रांति के दौरान मोतिहारी में स्थानीय युवाओं ने ब्रिटिश शासन के प्रतीकों को चुनौती दी. आंदोलनकारियों ने लाठियों और संगीनों की परवाह किए बिना कचहरी और अनुमंडल कार्यालयों पर यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने का प्रयास किया.

ब्रिटिश फौज ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कार्रवाई की. आंदोलनकारियों पर गोलीबारी की गई, जिसमें चंपारण के कई लोगों ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए.

चंपारण के वीर सपूतों ने दी शहादत

अगस्त क्रांति के दौरान चंपारण के आठ वीर सपूतों के बलिदान का उल्लेख मिलता है. इनमें रामेश्वर मिश्र, गणेश राव, गणेश राय, भागवत उपाध्याय और महज 13 वर्ष के जगन्नाथपुरी सहित अन्य क्रांतिकारी शामिल थे.

इन स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान चंपारण के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है. उनके संघर्ष ने आने वाली पीढ़ियों को देश की आजादी के लिए त्याग और साहस की प्रेरणा दी.

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1857 के बाद सबसे गंभीर विद्रोह बताया गया

अगस्त क्रांति की व्यापकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन वायसराय लिनलिथगो ने ब्रिटिश सरकार को भेजे एक गुप्त पत्र में भारत छोड़ो आंदोलन को 1857 के विद्रोह के बाद का सबसे गंभीर विद्रोह बताया था.

चंपारण में इस आंदोलन की गूंज ने यह साबित किया कि महात्मा गांधी की कर्मभूमि केवल सत्याग्रह और अहिंसा के इतिहास तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत छोड़ो आंदोलन में भी यहां के लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक संघर्ष किया था.

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By Intejarul Haq

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