अब तक शुरू नहीं हुई गेहूं की खरीद

लापरवाही . सरकार ने समर्थन मूल्य घोषित कर गेहूं खरीद का दिया आदेश समर्थन मूल्य घोषित करते हुए गेहूं खरीद करने की सरकार ने घोषणा कर दी है, लेकिन जिले में अब तक गेहूं की खरीदारी शुरू नहीं हुई है. हालांकि, अधिक गर्मी और कम ठंड के कारण गेहूं का उत्पादन पिछले वर्ष की अपेक्षा […]

लापरवाही . सरकार ने समर्थन मूल्य घोषित कर गेहूं खरीद का दिया आदेश

समर्थन मूल्य घोषित करते हुए गेहूं खरीद करने की सरकार ने घोषणा कर दी है, लेकिन जिले में अब तक गेहूं की खरीदारी शुरू नहीं हुई है. हालांकि, अधिक गर्मी और कम ठंड के कारण गेहूं का उत्पादन पिछले वर्ष की अपेक्षा 15 से 20 प्रतिशत कम रहा है. वहीं दूसरी ओर मुश्किल से लागत निकलने की उम्मीद में बैठे किसान इसे ज्यादा से ज्यादा कीमत पर बेचना चाहते हैं. लेकिन बाजार मनचाही कीमत देने के लिए तैयार नहीं.
मधेपुरा : इस वर्ष सरकार की ओर से खरीदे जाने वाले अनाज के भुगतान की प्रक्रिया की जटिलता और लंबी अवधि के कारण जरूरतमंद किसान औने पौने भाव में बाजार के हाथों अपना अनाज बेचने के लिए मजबूर हैं. डीएओ यदुनंदन प्रसाद कहते हैं कि इस बार गेहूं के उत्पादन में कमी आयी है. किसान इतने पैदावर से संतष्ट नहीं हैं. कृषि वैज्ञानिक कृषि विकास केंद्र के कार्यक्रम समन्वयक डाॅ मिथिलेश कुमार राय कहते हैं कि पूरे दिसंबर व जनवरी के पहले हप्ते में तापमान 20-25 डिग्री होना चाहिए जो नहीं था.
तापमान 25-30 डिग्री रहने के कारण पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष गेहूं के उत्पादन में कमी आयी है. मौसम के खराब रहने के बावजूद भी इस वर्ष गेहूं का उत्पादन 25 हजार 268 मीट्रिक टन हुआ है.
खरीद लाभ मिले किसानों को तो बने बात . जिले में इस बार 14 हजार मीट्रिक टन गेहूं अधिप्राप्ति का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. लेकिन इस खरीदगी का लाभ किसानों को मिले तो बात भी बने. आम तौर पर सरकार की इस खरीद योजना का लाभ गरीब किसानों के बजाय अमीर किसान और व्यापारी ही उठा लेते हैं. वैसे भी पिछले वर्ष 2014-15 के तुलना में इस बार गेहूं का उत्पादन कम हुआ है. किसान अधिक से अधिक कीमत पर अपना अनाज बेच कर लागत निकाल लेना चाहते हैं. इस वर्ष किसानों को प्रतिक्वींटल लगभग 1525 रूपये निधारित किया गया है.
धान अधिप्राप्ति का भुगतान अब भी लंबित . भुगतान की लंबी एवं जटिल प्रक्रिया के कारण किसान पैक्स को गेहूं नहीं बेचना चाहते हैं. अब तक धान का भुगतान भी लंबित है. पैक्स समय पर भुगतान नहीं करते. किसानों का कहना है कि पैक्स द्वारा समय पर रूपया नहीं दिये जाने के कारण वे खुले बाजार में गेहूं बेचने को मबूर हैं.
क्योंकि उन्हें खुले बाजार में गेंहूं की कीमत हाथों-हाथ दे दी जाती है. यदि पैक्स के माध्यम से किसानों को समय पर रूपया दे दिया जाय तो किसानो को लाभ तो मिलेगा ही साथ ही सरकार भी समय पर अपने गोदामों को भर सकती है. वहीं कई किसानों का कहना है कि उन्होंने जो वर्ष 2013-14 में गेहूं बेचा था उसकी भी राशि अब तक बिहट के बैंक से नहीं आयी.
पैक्स करती है मनमानी . सदर प्रखंड के अरूण व उपेंद्र मेहता का कहना है कि पिछले साल वे धान पैक्स को दिये थे जिसका भुगतान दो महीने बाद किया गया. इसिलिए वे इस बार पैक्स को गेहूं नहीं देकर खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं. शंकरपुर प्रखंड के रास बिहारी यादव व चंदेश्वरी यादव का कहना है कि पैक्स क्या होता है उन्हें मालूम ही नहीं. क्योंकि चुनाव के दौरान ही उन्हें पता चल पाता है कि पैक्स भी कोई चीज है. लेकिन चुनाव के बाद पैक्स व पैक्स का कार्यालय कहां है वे उसे ढूंढ़ते- ढूंढ़ते परेशान हो जाते हैं. अंतत: बाजार भी खुले बाजार में ले आते है. जहां उन्हें जो भी पैसा मिलता है कम से कम दुकानदार व साहूकारों को देकर संतुष्ट तो हो जाते हैं. पैक्स से न तो उन्हें न खाद बीज मुहैया करायी जाती है और न किरासन तेल. पैक्स बस नाम के लिए है, जिसे पैक्स अध्यक्ष दुधारू गाय के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.

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