दिल्ली मजदूरी करने गये विजय टीबी को दी मात, सरकारी की मदद से बची जान

अगर समय पर मेरे बेटे को सही इलाज नहीं मिलता, तो हमारे बुढ़ापे का सहारा आखिर बनता कौन

लखीसराय

अगर समय पर मेरे बेटे को सही इलाज नहीं मिलता, तो हमारे बुढ़ापे का सहारा आखिर बनता कौन. बेटे की लगातार गिरती सेहत और कमजोरी को देखकर मन हमेशा किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत रहता था, ये भावुक शब्द लखीसराय के रहने वाले सकल दास के हैं, जिनकी आंखों में आज अपने इकलौते बेटे विजय को स्वस्थ देखकर एक सुकून भरी चमक है. विजय, जो अपने बूढ़े मां-बाप की उम्मीदों का एकमात्र केंद्र है, जीवन की आपाधापी में मौत के करीब पहुंच गया था, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की सतर्कता ने उसे एक नया जीवनदान दिया है. आज विजय न केवल स्वस्थ है, बल्कि वह फिर से अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हो चुका है.

अनजान बीमारी और परदेश की मजबूरी

विजय की यह कहानी उन हजारों प्रवासी मजदूरों की व्यथा को दर्शाती है, जो अपनों की भूख मिटाने के लिए अपने ही शरीर की चीख को अनसुना कर देते हैं. अपने बूढ़े माता-पिता के भरण-पोषण की खातिर विजय घर से सैकड़ों कोस दूर दिल्ली की भीड़भाड़ वाली गलियों में मजदूरी करने गया था. वहां दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत और धूल-मिट्टी के बीच काम करते हुए कब टीबी (क्षय रोग) के बैक्टीरिया ने उसके फेफड़ों पर कब्जा कर लिया, उसे इसका आभास तक नहीं हुआ. वह लगातार गिरती सेहत, कम होती भूख और बढ़ती थकान को केवल काम का बोझ और सामान्य कमजोरी समझता रहा. वह अक्सर सोचता था कि शायद दिल्ली की भागदौड़ और खान-पान में कमी की वजह से उसका शरीर साथ नहीं दे रहा है, और इसी गलतफहमी में वह संक्रमण को पालता रहा. टीबी एक ऐसा साइलेंट किलर है जो समय पर इलाज न मिलने पर इंसान को मौत के मुहाने तक ले जाता है, और विजय के साथ भी यही हो रहा था.

निजी क्लीनिक की सतर्कता और सदर अस्पताल का सहारा

जब विजय की स्थिति काफी बिगड़ गयी और वह शारीरिक रूप से काम करने में पूरी तरह असमर्थ हो गया, तब वह भारी मन से वापस अपने घर लखीसराय लौटा. यहां स्वास्थ्य विभाग की वह रणनीति बेहद कारगर साबित हुई, जिसके तहत जिला कार्यक्रम प्रबंधक सुधांशु नारायण लाल ने जिले के सभी निजी अस्पतालों को सख्त निर्देश दे रखे थे. नियम यह है कि यदि किसी भी निजी अस्पताल में टीबी का कोई संदिग्ध लक्षण वाला मरीज आता है, तो उसे तुरंत सरकारी तंत्र से जोड़ना अनिवार्य है. विजय जब इलाज के लिए शहर के एक निजी अस्पताल पहुंचा, तो चिकित्सकों ने उसके लक्षणों को देखते ही उसे टीबी का संदिग्ध माना और तत्काल सदर अस्पताल रेफर कर दिया. यहां विजय की जांच हुई और टीबी की पुष्टि होने के बाद उसे तुरंत चिकित्सक के तहत उपचार पर रख लिया गया. अगले सात महीनों तक उसे न केवल नियमित रूप से निःशुल्क दवाइयां उपलब्ध करायी गयी, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की टीम ने उसके पोषण और रिकवरी की भी लगातार निगरानी की.

जिले में टीबी मुक्ति के लिए बड़े स्तर पर प्रयास

विजय जैसे मरीजों को बचाने के लिए जिला प्रशासन अब बेहद गंभीर मोड में काम कर रहा है. जिला संचारी रोग पदाधिकारी डॉ श्रीनिवास शर्मा ने जिले की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्तमान में लखीसराय जिले में कुल 288 लोग टीबी संक्रमण से जूझ रहे हैं, जिनका सरकारी खर्च पर उच्चस्तरीय इलाज किया जा रहा है. जिलाधिकारी के विशेष निर्देश पर जिले को टीबी मुक्त बनाने के लिए ”100 डेज टीबी जागरूकता कार्यक्रम” का आगाज किया गया है. इसके तहत न केवल लोगों को जागरूक किया जा रहा है, बल्कि सदर अस्पताल के ओपीडी में आने वाले 40 वर्ष से अधिक उम्र के प्रत्येक मरीज का अनिवार्य रूप से डिजिटल एक्स-रे कराया जा रहा है ताकि संक्रमण को शुरुआती दौर में ही पकड़ा जा सके. स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य है कि कोई भी विजय अपनी कमजोरी को सामान्य न समझे और समय रहते अस्पताल पहुंचकर अपना जीवन सुरक्षित करे. आज विजय फिर से काम पर लौटने की तैयारी में है, जो जिले के स्वास्थ्य मिशन की एक बड़ी जीत है.

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