बीमारी से ज्यादा घर के चूल्हे की फिक्र थी, निशुल्क इलाज ने दे दी नयी जिंदगी

जब कंधे पर परिवार की जिम्मेदारी हो व हाथ में पकड़ी कुदाल बीमारी की वजह से छूट जाय

टीबी को मात देकर काम पर लौटे संजय

लखीसराय

जब कंधे पर परिवार की जिम्मेदारी हो व हाथ में पकड़ी कुदाल बीमारी की वजह से छूट जाय, तो शरीर के दर्द से ज्यादा रूह कांप जाती है. टीबी का नाम सुना तो लगा कि अब कर्ज की खाई में डूब जाऊंगा और बच्चे भूखे सोयेंगे, लेकिन विभाग के निशुल्क इलाज और चिकित्सकों के भरोसे ने मुझे मौत के मुंह से खींच लिया, यह रुंधे हुए गले से कही गयी बातें उस संजय पासवान की हैं, जो कभी टीबी की गिरफ्त में आकर जिंदगी से हार मान चुके थे, लेकिन आज पूरी तरह स्वस्थ होकर फिर से अपनी मजदूरी के जरिए परिवार का स्वाभिमान पाल रहे हैं. उनकी सात महीने की कठिन रिकवरी और विभाग की सक्रियता आज लखीसराय के लिए एक मिसाल बन गयी है. पहचान से लेकर रिकवरी तक का सफर संजय की कहानी विभाग की सक्रियता का जीता-जागता प्रमाण है. जिला संचारी रोग पदाधिकारी डॉ श्रीनिवास शर्मा बताते हैं कि समुदाय स्तर पर चलाये जा रहे पहचान अभियान के दौरान संजय के लक्षणों को पकड़ा गया. जांच में टीबी की पुष्टि होते ही तत्काल इलाज शुरू कर दिया गया. डॉ शर्मा के अनुसार संजय की रिकवरी इसलिए संभव हो पायी, क्योंकि उन्होंने बिना एक भी दिन छोड़े सात महीने तक दवा का सेवन किया. वे कहते हैं, उनके लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था, अगर जेब से पैसे देने पड़ते, तो शायद वे इलाज बीच में ही छोड़ देता, लेकिन सरकारी सहयोग ने उन्हें नयी जिंदगी दी है. “समाज के लिए एक मिसाल संजय अब केवल एक स्वस्थ व्यक्ति नहीं, बल्कि टीबी के खिलाफ एक ””सर्वाइवर”” और ””चैंपियन”” के रूप में देखे जा रहे हैं.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Rajeev Murarai Sinha Sinha

Rajeev Murarai Sinha Sinha is a contributor at Prabhat Khabar.

Tags

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >