ग्रामीणों की ख्वाहिश : आनंदपुर मसजिद में फिर से नमाज अदा की जाये

मेदनीचौकी : सूर्यगढ़ा थाना क्षेत्र के पिपरिया प्रखंड स्थित आनंदपुर गांव की सदियों पुरानी काफी जर्जर हो गयी है. इस गांव में कभी 30 मुसलिम परिवार हुआ करते थे. सभी अंसारी बिरादरी के थे. इनमें आंधी मोमिन की आठ डिसमिल जमीन पर मसजिद बनी हुई है जो रख-रखाव के अभाव में टूट-फूट गयी. वहीं एक […]

मेदनीचौकी : सूर्यगढ़ा थाना क्षेत्र के पिपरिया प्रखंड स्थित आनंदपुर गांव की सदियों पुरानी काफी जर्जर हो गयी है. इस गांव में कभी 30 मुसलिम परिवार हुआ करते थे. सभी अंसारी बिरादरी के थे.
इनमें आंधी मोमिन की आठ डिसमिल जमीन पर मसजिद बनी हुई है जो रख-रखाव के अभाव में टूट-फूट गयी. वहीं एक कट्ठे जमीन पर गढ़ बना हुआ था जिस पर बसे 20 परिवार कभी बुनकर का काम करते थे. आंधी मोमिन के प्रपौत्र मो नजामुद्दीन ने बताया कि 1939 में मसजिद का पक्कीकरण किया गया था. इसके पूर्व यह कच्ची और खपरैल थी.
1989-90 के भागलपुर दंगे के समय घबरा कर वे लोग गांव छोड़ कर लखीसराय, सूर्यगढ़ा, जमुई आदि जगहों पर बस गये और विभिन्न धंधों से जुड़ गये. ग्रामीण 81 वर्षीय राम स्वरूप यादव ने कहा कि भागलपुर दंगे के दौरान दहशतजदा परिवारों का उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाया गया.
किसी को भी किसी तरह की शारीरिक, मानसिक या आर्थिक नुकसान नहीं होने दिया गया. गांव के लोगों ने बहुत चाहा कि वे लोग इस गांव में ही रहे. लेकिन वे लोग नहीं माने. बाद में मुस्तफा मोमिन गांव आये और करीब 10 वर्ष रहे. तब वे पवई पंचायत के सरपंच हुआ करते थे. गांव में उनकी इज्जत थी.
मसजिद की दीवार पर उग आये हैं नीम व पीपल के पौधे
सुलेमान मोमिन, राफो अंसारी, फजल अंसारी, गुलाम मुस्तफा आदि अपनी जमीन-जायदाद बेच कर गांव से पलायन कर गये. मो नजामुद्दीन अंसारी को अपने गांव की माटी से अब भी लगाव है.
जब तब आते हैं. टूटी मसजिद देख कर उनकी आंखें भर जाती है. मसजिद की दीवारों पर पीपल व नीम के पौधे उग आये हैं. मसजिद भुतहा खंडहर बन कर रह गया है. शुरू में ग्रामीणों ने श्रमदान के माध्यम से मसजिद की मरम्मत करायी.
ग्रामीण राम स्वरूप यादव कहते हैं कि यह मसजिद हिंदू-मुस्लिम कौम के बीच मुहब्बत का पैगाम देता प्रतीत होता है. गांव के राजनाथ यादव के मुताबिक विभिन्न मुस्लिम पर्व-त्योहारों के मौके पर उक्त मसजिद की मरम्मत की मांग की गयी है. ग्रामीणों की बड़ी ख्वाहिश है कि मसजिद में एक बार फिर नमाज अता करने की परंपरा शुरू हो.

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