गाद के कारण सिमट रहा गंगा-कोसी का अस्तित्व, गहराता जा रहा है कटाव का संकट

गाद के कारण सिमट रहा गंगा-कोसी का अस्तित्व

नदियों में बने बालू के बड़े-बड़े टीले, मालवाहक जहाजों का परिचालन हुआ मुश्किल, विशेषज्ञों की चेतावनी बेअसर

कुरसेला. कोसी व गंगा नदियों का प्रवाह दायरा अप्रैल-मई माह में सिमट कर रह जाता है. नदियों के सिमटते प्रवाह के पीछे कई तर्क दिये जाते हैं, जिनमें नदियों में गाद का भरना एक प्रमुख कारण माना जा रहा है. जानकार विशेषज्ञों का मानना है कि गाद की वजह से नदियां बाढ़ व कटाव की समस्या को बढ़ाने का कार्य करती रहती हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नदियों की धारा से गाद को हटाया जाए, तो कटाव की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. विडंबना यह है कि दशकों से नदियों से गाद निकालने की कोई ठोस योजना धरातल पर नहीं उतरी है. गाद निकलने से नदी की गहराई बढ़ेगी व जलधारा अपने निश्चित दायरे में सीमित रहेगी. इसके विपरीत, प्रवाह में अवरोध होने से नदियां अनियंत्रित होकर विनाशकारी कटाव का रुख अख्तियार कर लेती हैं.

पर्यावरणविदों के अनुसार, गाद की सफाई से गंगा की स्वच्छता भी बढ़ेगी. वर्तमान में ”नमामि गंगे” जैसे अभियानों का नदी पर अपेक्षित असर नहीं दिख रहा है व जल की गुणवत्ता गिरती जा रही है. जमा होते गाद के कारण नदी के बीच में बालू के बड़े-बड़े टीले बन जाते हैं, जिससे मुख्य धारा कई उपधाराओं में बंट जाती है व गहराई कम हो जाती है.

जानकारी के अनुसार, कोलकाता से बनारस जाने वाले मालवाहक जहाजों को जलस्तर कम होने के कारण कई जगहों पर फंसना पड़ता है. जहाज कंपनियों को अक्सर स्वयं गाद हटाकर रास्ता बनाना पड़ता है. कुछ वर्ष पूर्व जलसंसाधन विभाग के विशेषज्ञों ने खेरिया में निरीक्षण के दौरान भरोसा दिया था कि गाद निकालकर कटाव का स्थायी समाधान किया जाएगा, लेकिन अब तक नतीजा सिफर ही रहा है. गंगा की तरह ही कोसी नदी का भी प्रवाह दायरा निरंतर सिमट रहा है, जिससे भविष्य में जल संकट व भौगोलिक परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है.

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By RAJKISHOR K

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