कटिहार जिले के कुरसेला में राष्ट्रीय राजमार्ग-31 के किनारे बसे बांस शिल्पी परिवार वर्षों से टोकरी और सूप बनाकर अपना जीवनयापन कर रहे हैं. सड़क किनारे अस्थायी तंबुओं में रहने वाले इन परिवारों की आजीविका पूरी तरह इसी पारंपरिक व्यवसाय पर निर्भर है. आर्थिक तंगी, अशिक्षा और मूलभूत सुविधाओं के अभाव के बीच इनका जीवन आज भी संघर्षों से घिरा हुआ है.
सड़क किनारे ही चलता है कारोबार
एनएच-31 किनारे दर्जनों परिवार बांस से टोकरी, सूप और अन्य घरेलू सामान तैयार कर बेचते हैं. परिवार के महिला और पुरुष दोनों इस काम में जुटे रहते हैं. राहगीरों और स्थानीय बाजारों में बिक्री से होने वाली आमदनी ही उनके परिवार की आय का मुख्य स्रोत है.
आवास मिलने के बाद भी नहीं छोड़ पा रहे सड़क किनारा
स्थानीय लोगों के अनुसार सरकार की ओर से आवास के लिए भूमि उपलब्ध कराई गई है, लेकिन रोजगार सड़क किनारे होने के कारण अधिकांश परिवार वहां बसने के बजाय एनएच-31 के किनारे ही रहना पसंद करते हैं. उनका कहना है कि बाजार और ग्राहकों के नजदीक रहने से रोजी-रोटी चलती है.
बुनियादी सुविधाओं का अभाव
इन परिवारों के लिए शौचालय, स्वच्छ पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधाओं की समुचित व्यवस्था नहीं है. खुले में शौच और दूषित पानी का उपयोग उनकी दैनिक जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है. सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन भी इनकी प्रमुख समस्याओं में शामिल है.
दुर्घटना का बना रहता है खतरा
व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे रहने के कारण इन परिवारों पर हमेशा सड़क दुर्घटना का खतरा मंडराता रहता है. छोटे-छोटे बच्चे भी सड़क के आसपास खेलते नजर आते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि बच्चों की शिक्षा पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जिससे उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है.
स्थायी पुनर्वास और जागरूकता की जरूरत
स्थानीय लोगों का मानना है कि इन परिवारों के स्थायी पुनर्वास, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता है. साथ ही उन्हें नशामुक्ति और आर्थिक प्रबंधन के प्रति जागरूक करने की भी जरूरत है, ताकि उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके.
