हवन-यज्ञ व वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ भभुआ शहर. शहर के आर्य निवास में गुरुवार की शाम चार बजे स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती श्रद्धा व उत्साह के साथ मनायी गयी. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रेमनाथ जायसवाल ने की, जबकि संचालन सुधीर कुमार वर्मा ने किया. कार्यक्रम का शुभारंभ दीप जला व वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन-यज्ञ कर किया गया. उपस्थित आर्यबंधुओं व मातृशक्ति ने यज्ञ में आहुति देकर समाज सुधार व वैदिक सिद्धांतों के पालन का संकल्प लिया. वक्ताओं ने महर्षि दयानंद के जीवन व कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा, जिला मोरबी में हुआ था. उनके पिता करशनजी लालजी तिवारी व माता यशोदा बाई थीं. उनका बचपन का नाम मूलशंकर था. उनके गुरु स्वामी विरजानंद थे, जिनसे उन्होंने वैदिक ज्ञान प्राप्त किया. उन्होंने 1875 में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की व समाज को वेदों की ओर लौटो का संदेश दिया. उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश की रचना कर वैदिक धर्म व सामाजिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया. वे बाल विवाह, सती प्रथा व छुआछूत जैसी कुरीतियों के विरोधी तथा विधवा विवाह व नारी शिक्षा के समर्थक थे. स्वामी दयानंद ने शिक्षा के क्षेत्र में डीएवी शिक्षण संस्थानों की नींव रखी, जो आगे चलकर देशभर में फैल गये. उनका निधन 30 अक्तूबर 1883 को अजमेर में हुआ. कार्यक्रम में डॉ अमरीश चतुर्वेदी, शिव शंकर, रामचंद्र, चंद्रवंशी, प्रभात वर्मा, पंकज कुमार, तेजस्वी सहित कई आर्यजन उपस्थित रहे. अंत में वैदिक घोष के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया.
श्रद्धा व उत्साह से स्वामी दयानंद सरस्वती की मनायी गयी जयंती
शहर के आर्य निवास में गुरुवार की शाम चार बजे स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती श्रद्धा व उत्साह के साथ मनायी गयी.
