दीवारों पर स्वच्छता के नारे, नीचे गंदगी का अंबार

स्वच्छता के दावे हवा-हवाई, भभुआ की जमीन पर पसरी गंदगी ने खोली पोल

स्वच्छता के दावे हवा-हवाई, भभुआ की जमीन पर पसरी गंदगी ने खोली पोल नगर पर्षद के डस्टबिन बने शोपीस व कूड़ा उठाव व्यवस्था हुई ठप शहर में कागजों और पेंटिंग तक सीमित रहा सफाई अभियान भभुआ शहर. स्वच्छ भारत मिशन व स्वच्छ सर्वेक्षण के तहत भभुआ शहर को स्वच्छ, सुंदर व स्वस्थ दिखाने के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं. शहर की दीवारों पर रंग-बिरंगी पेंटिंग, स्वच्छता के नारे, महापुरुषों के चित्र व आकर्षक स्लोगन के जरिये यह संदेश दिया जा रहा है कि भभुआ स्वच्छता की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है. लेकिन, जब इन दावों की नजर जमीन पर जाती है, तो हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है. शहर के कई हिस्सों में पसरी गंदगी, महीनों से जमा कचरा, उगी झाड़ियां, बदहाल डस्टबिन व ठप कूड़ा उठाव व्यवस्था यह साबित करने के लिए काफी है कि स्वच्छता अभियान भभुआ में कागजों व दीवारों तक ही सीमित रह गया है. भभुआ शहर की जमीनी हकीकत नगर पर्षद के तमाम दावों की हवा निकालने के लिए पर्याप्त है. शहर के प्रमुख इलाकों से लेकर मुहल्लों व वार्डों तक स्थिति लगभग एक जैसी है. सड़कों के किनारे, खाली प्लॉटों में, नालियों के पास व दीवारों के नीचे कचरे के ढेर इस तरह जमे हुए हैं, मानो लंबे समय से कूड़ा उठाव की कोई व्यवस्था ही नहीं हो. कई स्थानों पर डस्टबिन या तो पूरी तरह भरे हुए हैं या फिर उल्टे पड़े हैं. कहीं-कहीं तो डस्टबिन केवल नाम के लिए रखे गये हैं या फेंके गये हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि महीनों से उनका उपयोग ही नहीं हुआ है. स्वच्छ सर्वेक्षण के तहत जिन दीवारों पर स्वच्छ भभुआ, स्वस्थ भभुआ जैसे नारे लिखे गये हैं, उन्हीं दीवारों के ठीक नीचे गंदगी का अंबार लगा हुआ है. स्वच्छता संदेशों से सजी दीवारों के नीचे झाड़ियां उग आयी हैं, प्लास्टिक कचरा बिखरा पड़ा है व निर्माण सामग्री इधर-उधर फैली हुई है. यह दृश्य नगर पर्षद की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है. यदि वास्तव में सफाई अभियान चलाया गया होता, तो दीवार पेंटिंग के आसपास कम से कम सफाई जरूर नजर आती. लेकिन हालात यह हैं कि न तो झाड़ू लगी दिखती है, न कचरा उठाया गया लगता है व न ही झाड़ियों की कटाई हुई प्रतीत होती है. इससे साफ जाहिर होता है कि स्वच्छ सर्वेक्षण की तैयारियां केवल दिखावे तक सीमित हैं. नगर पर्षद का पूरा फोकस दीवारों को रंगने, बैनर लगाने व फोटो खिंचवाने पर रहता है, जबकि असली काम यानी नियमित सफाई व कचरा प्रबंधन पूरी तरह ध्वस्त है. दीवारें भले ही चमक रही हों, लेकिन उनके नीचे की गंदगी भभुआ की असल तस्वीर बयां कर रही है. थाने के पास कूड़ा नहीं उठा, आग के हवाले किया गया कचरा शहर में सफाई व्यवस्था की लापरवाही उस समय और गंभीर हो गयी, जब थाने से सटे बाउंड्री के पास जमा कूड़े का उठाव नहीं किया गया. लंबे समय तक कचरा पड़े रहने के बाद उसे हटाने के बजाय आग के हवाले कर दिया गया. इससे आसपास धुआं व बदबू फैल गयी. स्थानीय लोगों को सांस लेने में परेशानी का सामना करना पड़ा. हैरानी की बात यह है कि यह स्थिति किसी दूर-दराज इलाके की नहीं, बल्कि थाने के समीप की है. निरीक्षण तक सीमित सफाई, बाद में हालात जस के तस सफाई अभियान केवल तभी सक्रिय होता है, जब किसी अधिकारी का निरीक्षण होना होता है या स्वच्छ सर्वेक्षण से जुड़ी टीम के आने की सूचना मिलती है. ऐसे समय में कुछ घंटों या एक-दो दिनों के लिए झाड़ू लगती है, कूड़ा उठाया जाता है व सड़कें अस्थायी रूप से साफ दिखने लगती हैं. लेकिन निरीक्षण समाप्त होते ही हालात फिर पुराने जैसे हो जाते हैं. कचरा उठाव की गाड़ियां अनियमित रूप से आती हैं और कई बार हफ्तों तक नजर नहीं आतीं. मजबूरी में लोग कचरा सड़कों के किनारे, खाली जगहों या नालियों में फेंकने को विवश हो जाते हैं. धीरे-धीरे वही स्थान स्थायी कूड़ाघर में तब्दील हो जाता है. नगर पर्षद द्वारा कागजों में भले ही रोजाना कूड़ा उठाव व सफाई कर्मियों की तैनाती दर्शायी जाती हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती. सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च दिखा दिये जाते हैं, लेकिन उसका असर शहर की सूरत पर नजर नहीं आ रहा है. सफाई निरीक्षक, सुपरवाइजर व वार्ड स्तर पर जिम्मेदार कर्मी तैनात होने के बावजूद निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल दिखायी दे रहा है.

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Author: VIKASH KUMAR

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