Kaimur News : परसियां स्थित चातुर्मास्य महायज्ञ एवं श्रीमद्भागवत कथा में पूज्य श्री लक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह के दिव्य प्रसंग का वर्णन किया. कथा के दौरान उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्त की जाति, कुल, धन, पद, प्रतिष्ठा या आयु नहीं देखते, बल्कि उसकी निष्कपट भक्ति और समर्पण भाव को देखते हैं. दासी पुत्र विदुर, निर्धन सुदामा और बालक प्रह्लाद पर भगवान की विशेष कृपा इसका प्रमाण है.
गर्भ में ही प्रह्लाद ने प्राप्त किया भागवत धर्म का ज्ञान
जीयर स्वामी जी ने बताया कि देवर्षि नारद के उपदेश से माता कयाधु के गर्भ में ही प्रह्लाद ने भागवत धर्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया था. राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद उनके मन में भगवान विष्णु के प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति थी. गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी प्रह्लाद निरंतर भगवान के स्मरण में लीन रहते थे. उन्होंने अपने साथियों को भी धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलने का संदेश दिया.
नवधा भक्ति का बताया महत्व
कथा के दौरान स्वामी जी ने नवधा भक्ति के स्वरूप की विस्तार से चर्चा की. उन्होंने बताया कि श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन नवधा भक्ति के प्रमुख अंग हैं. उन्होंने कहा कि मनुष्य इन भक्ति मार्गों में से किसी एक का भी सच्चे मन से अनुसरण करे तो वह भगवान की कृपा प्राप्त कर सकता है.
प्रह्लाद को यातनाएं देकर भी नहीं डिगा पाए हिरण्यकशिपु
जीयर स्वामी जी ने हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि पुत्र की भगवान विष्णु के प्रति भक्ति से हिरण्यकशिपु अत्यंत क्रोधित था. उसने प्रह्लाद को कई प्रकार की यातनाएं दीं, लेकिन बालक प्रह्लाद की श्रद्धा और भक्ति में कोई कमी नहीं आई. भगवान की कृपा से प्रह्लाद हर संकट से सुरक्षित निकलते रहे.
स्तंभ से प्रकट हुए भगवान नरसिंह
नरसिंह अवतार का प्रसंग सुनाते हुए स्वामी जी ने कहा कि भगवान कण-कण में विद्यमान हैं. हिरण्यकशिपु ने जब प्रह्लाद से पूछा कि क्या भगवान इस स्तंभ में भी हैं, तो प्रह्लाद ने भगवान के सर्वव्यापी होने की बात कही. इसके बाद हिरण्यकशिपु के स्तंभ पर प्रहार करते ही भगवान नरसिंह प्रकट हुए और उसका वध किया.
प्रह्लाद ने पिता की सद्गति और निष्काम भक्ति मांगी
स्वामी जी ने कहा कि भगवान नरसिंह के सामने प्रह्लाद को वर मांगने का अवसर मिला, लेकिन उन्होंने सांसारिक सुख-सुविधाओं की मांग नहीं की. उन्होंने अपने पिता हिरण्यकशिपु की सद्गति और भगवान के प्रति निष्काम भक्ति का वर मांगा. यह प्रह्लाद के त्याग, करुणा और अटूट भक्ति का उदाहरण है.
अटल श्रद्धा के सामने नहीं टिकता भय और अहंकार
जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि भक्त प्रह्लाद की कथा मनुष्य को अटल श्रद्धा और विश्वास का संदेश देती है. भय, विपत्ति और अहंकार के सामने भी यदि भक्ति और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा जाए तो अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है. उन्होंने श्रद्धालुओं से जीवन में निष्काम भक्ति, सदाचार और धर्म के मार्ग को अपनाने का आह्वान किया.
