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फिल्म की तरह दिखने लगता है पहली बार लहराता तिरंगा

स्वतंत्रता सेनानियों की मानें तो गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस में है अन्योन्याश्रय जुड़ाव जमुई : प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन आज से 64 वर्ष पूर्व हमारे देश का संविधान लागू किया गया था. स्वतंत्रता सेनानी शिवेंद्र शरण सिंह बताते हैं कि 26 […]

स्वतंत्रता सेनानियों की मानें तो गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस में है अन्योन्याश्रय जुड़ाव

जमुई : प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन आज से 64 वर्ष पूर्व हमारे देश का संविधान लागू किया गया था. स्वतंत्रता सेनानी शिवेंद्र शरण सिंह बताते हैं कि 26 जनवरी को हमारे देश का संविधान लागू करने के पीछे एक ऐतिहासिक भावना यह जुड़ी हुई है कि इसी दिन 1930 में लाहौर के रावी नदी के तट पर आंदोलनकारियों ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार के झंडे को हटा कर पहली बार तिरंगा झंडा फहराया गया था.
हमसबों को अंग्रेजों के चंगुल से 15 अगस्त 1947 को आजादी मिल गयी थी, लेकिन हमारे देश को 26 जनवरी 1950 को गणतांत्रिक राष्ट्र का दर्जा प्राप्त हुआ था. हमें यह गौरव लाखों वीर सपूतों की कुर्बानी के बाद प्राप्त हुआ. उनकी मानें तो आजादी की लड़ाई में हमारे दर्जनों वीर सपूतों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया.
जिले से दर्जनों लोगों ने आजादी की लड़ाई में दिया था अपना योगदान
जंग-ए-आजादी की लड़ाई के बारे में पूछे जाने पर सदर प्रखंड क्षेत्र के प्रतापपुर निवासी सह स्वतंत्रता सेनानी शिवेंद्र शरण सिंह बताते हैं कि आजादी की लड़ाई में जिले के कुमार कालिका सिंह(महुलीगढ़), बिंदेश्वरी सिन्हा(जमुई), जगदीश मिस्त्री(मांगोबंदर), यमुना प्रसाद सिंह(महिसौड़ी), लक्ष्मण सिंह(बिहारी), दु:खहरण प्रसाद व केदार सिन्हा(गरसंडा), श्यामा प्रसाद सिंह, रामबल्लभ चतुर्वेदी व बलदेव मिश्र (मलयपुर), योगेंद्र शुक्ल(चकाई), रामगुलाम सिंह(खड़हुई), बलदेव पासवान(काकन), बोधनारायण सिंह(चौहानडीह), देवकी सिंह(नीमारंग) व रेवा दास(लक्ष्मीपुर) समेत दर्जनों वीर सपूतो ने अपना त्याग व बलिदान देकर इस देश को आजाद कराने में अपनी भूमिका निभायी थी. साथ ही बताया कि आजादी की लड़ाई के दौरान महादेव सिमरिया, मांगोबंदर, सोनाय, रतनपुर, धधौर समेत दर्जनों जगहों पर कचहरियां जलायी गयी थी. साथ ही शराब खानों को नष्ट भी किया गया था. लेकिन सबसे दुखद बात यह है कि सरकार, प्रशासन व स्थानीय लोगों ने हम स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना भी छोड़ दिया है.
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